Wednesday, 31 December 2014

Happy New Year


Monday, 29 December 2014

अलविदा 2014, स्वागतम् 2015


मैं 2014 अपने 12 महिने के जीवन से विदा हो रहा हुँ। आज मैं अपने भारतीय परिवेश के अस्तित्व को आप सबसे शेयर करुँगा। मेरे इस जीवन में मुझे मंगल पर पहुँचने का कीर्तिमान मिला तो कहीं मेरी छवि को कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा लहुलूहान होना पङा। मेरा 365 दिनों का जीवन समुन्द्र की तरह उथल-पुथल भरा था। कभी ज्वार तो कभी भाटे की तरह कुछ पाया तो कुछ खोया। राजनीति के गलियारे में मैने राष्ट्रीय फूल को खिलते देखा, जिसकी पंखुङियां लगातार खिलती हुई, अपनी राष्ट्रीयता और भारतीयता को प्रस्फुटित कर रही हैं।

मित्रों, गाँधी के स्वच्छ भारत के जोश को देखकर  मेरे मन में ये प्रश्न उठना लाजमी है कि, स्वच्छ मानसिकता के समाज का आगाज कब होगा जहाँ बेटियां निर्भय होकर आवागमन कर सकें क्योंकि मेरे जीवन के आखरी महिने में पुनः नारी की छवि पर विभत्स मानसिकता का तेजाबी प्रहार हुआ। जिसने मुझे इस बात पर सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि आखिर हम कब नारि के लिये सम्मानित संसार की रचना कर सकेगें।
आज हम प्रगति का मापदंड भौतिक सुख-सुविधा के  तराजू में तौल रहे हैं। कभी रेडियो भी बमुश्किल लोगों के पास होता था, किन्तु आज घर की छत भले ही प्लास्टिक या खपरैल की हों लेकिन उस पर  टाटा स्काई या डिश टीवी की छत्रछाया जरूर नजर आयेगी। प्रगति की दौङ में, मैं आज काफी आगे हुँ। आधुनिक हथियारों और विज्ञान की नई उपलब्धियों से मालामाल हुँ। अपनी इस कामयाबी पर मैं जश्न मनाऊँ या खौफजदा छोटी बच्चियों को देखकर मरती इंसानियत पर आंसु बहाऊँ।

जाते-जाते मेरे जीवन के आखरी पलो ने मुझे मेरे पङोसी का ऐसा दर्द दिखाया कि अश्रु की धारा अविलंब निकल पडी। जिसमे पङोसी द्वारा मेरे भाई 2008 पर हुए दर्द को भी हम भूलकर उसके गम में शामिल हुए, क्योकिं पडोस में जो हुआ वो भी इंसानियत का क्रूर संहार था। जो इतिहास में दफन हो गया था वो पुनः हरा हो गया।

मित्रों, जहाँ मैने इतने व्यथित और मन को विहल करने वाले क्षंण देखे तो वहीं कुछ पल खुशियाँ भी दे गए।   गमों की रात के बाद मेरे जीवन में कुछ खुशियाँ भी रौशन हुईं।  राजनीति और शिक्षा के ध्रुव को भारत रत्न से अलंकृत होते देखने का सपना साकार हुआ तो कहीं बच्चों की मासूमियत को समझने वालों को विश्व के सर्वोच्च सम्मान नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। जन-जन की भाषा हिन्दी का सम्मान हुआ। गूगल जैसे सर्च इंजन को भी हिन्दी की शरण में आना पडा।

मित्रों दुःख और खुशी की दरिया में गोते लगाते हुए अब मैं आप सबसे विदा हो रहा हुँ। जाते-जाते अपने भाई 2015 का  स्वागत अंनत मंगल कामनाओं के साथ करता हुँ।

मेरे भाई 2015 का सफर खुशियों और सफलताओं से भरा हो,  मजहबी अंतर को भूलकर अनेकता में एकता की पहचान का सम्मान हो, बेटियों के लिये बेकौफ आसमान की छाया हो, क्रूर मानसिकता को ऐसा दंड दिया जाए कि फिर कोई  विभत्स मानसिकता अपना फन न फैला सके। नये वर्ष की अगवानी में आत्मविश्वास का आगाज लिये सभी के लबों पर हो, नव वर्ष मंगलमय हो। 







Wednesday, 24 December 2014

संसदिय गरिमा को आत्मसात करने वाले, आदरणीय अटल जी


प्रखर राष्ट्रवादी भारतमाता के सपूत पं. अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म दिवस '25 दिसंबर' को 'सुशासन दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय अति प्रशंसनिय है। आदरणीय अटल जी अनुशासन के परिचायक हैं। साथ ही वर्तमान सरकार द्वारा आदरणीय अटल जी को गणतंत्र दिवस पर भारत रत्न से अलंकृत करने की घोषणा अत्यधिक हर्ष का विषय है। संसदिय गरिमा को आत्मसात करने वाले आदरणीय अटल जी श्रेष्ठ सांसदो में से एक हैं। अटल जी को बाल्यकाल से ही अनुशासन प्रिय पिता के सानिध्य में नैतिकता की शिक्षा प्राप्त हुई थी। जनसंघ के संस्थापक सदस्य आदरणीय अटल जी ने सांसद के रूप में अभूतपूर्व सफलता का अवदान देकर भारतीय राजनीति में पर्याप्त सफलता अर्जित की है।

कवि और प्रभावशील लेखन के धनी अटल जी का राजनीति सफर भारत की आजादी से पहले ही शुरु हो गया था। परंतु सांसद के रूप में अटल जी का सफर 1957 से शुरू हुआ। जब कांग्रेस सरकार, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सभी लोगों को जेल के सिकंजो के पीछे भेज दी थी, तब उस समय संसद में संघ की बात कहने वाला कोई नही था। संघ के वरीष्ठ नेताओं ने निर्णय लिया कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ भी अपनी एक पार्टी बनाये, जो चुनाव में भाग ले। तब अनुभवी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ पार्टी बनाई गई। 21 अक्टुबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ पार्टी का पहला अधिवेशन हुआ। 1952 में कश्मीर की जेल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुर्खजी की संदिग्ध अवस्था में मृत्यु हो गई। अटल जी उनके व्यक्तिगत सचिव थे। मुर्खजी की अचानक मृत्यु से अटल जी को बहुत दुःख हुआ, देशभक्ति के ज्वार ने अटल जी को विहल कर दिया और वे राजनीति में प्रवेश किये। 

अपनी अप्रतिम भाषा कौशल और आकर्षण व्यक्तित्व के कारण अटल जी भारतीय जनसंघ के सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता बन गये। अटल जी के काव्यात्मक, सरल, सरस भाषणों ने उन्हे व्यापक लोकप्रियता दिलाई। 1957 का जब चुनाव हुआ तब पार्टी ने अटल जी को लखनऊ, बलरामपुर और मथुरा से प्रत्याशी बनाया। नई पार्टी, नया नेता, नया चुनाव सबकुछ नया था। अटल जी बलरामपुर सीट से जीत गये किन्तु लखनऊ और मथुरा से हार गये थे। 1957 के लोकसभा के चुनाव में अटल जी के अलावा तीन सदस्य और चुने गये थे। लोकसभा के अपने शुरुवाती दिनों के बारे में
अटल जी कहते हैं कि
"हम सभी विधाई कार्य के लिये नए थे। न कोई पूर्व अनुभव था और ना कोई पूर्व पार्टी का सदस्य था, जो हम लोगों का मार्ग-दर्शन करता। संख्या कम होने की वजह से सभी सांसद को संसद में पिछली सीट पर स्थान मिला था। ऐसी स्थिती में लोकसभा अध्यक्ष का ध्यान अपनी ओर खींचना बहुत मुश्किल था।"

उस दौरान जवाहर लाल नेहरु प्रधानमंत्री के साथ विदेश मंत्री भी थे। अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर सदन में गम्भीर चर्चा होती थी। जब विदेश मंत्रालय की चर्चा होती थी तो सदन खचाखच भरा होता था और दर्शक दीर्घा में भारी भीङ होती थी। विदेश नीति अटल जी का प्रिय विषय था। उन्होने एम.ए. राजनीति में विशेष विषय के अंर्तगत विदेश नीति ही लिया था। अपने विदेश नीति के भाषण के बारे में अटल जी कहते हैं कि

"विदेश नीति पर मेरे पहले भाषण ने ही सदन का ध्यान आकृष्ट किया था। मेरी प्रांजल भाषा और धारा प्रवाह शैली सबको पसंद आती थी। 20 अगस्त 1958 को प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु जी ने अपना अंग्रेजी भांषण समाप्त करने के बाद अध्यक्ष जी से हिन्दी में कहने की अनुमति माँगी, सदस्यों ने तालियों से उनका स्वागत किया। नेहरु जी ने मेरा नाम लेकर हिन्दी में बोलना शुरु किया" 

नेहरु जी ने कहा,  "कल जो भाषण हुए उनमें से एक भाषण श्री वाजपेयी जी का हुआ। अपने भाषण में उन्होने एक बात कह थी, वो ये कि मेरे ख्याल से जो मेरी विदेश नीति है, मेरी राय में सही है। मैं उनका मसगूर हुँ की उन्होने ये बात कही किन्तु एक बात उन्होने और भी कही कि, बोलने के लिये वांणी चाहिये लेकिन चुप होने के लिये वाणी और विवेक दोनो चाहिये। इस बात से मैं पुरी तरह सहमत हुँ। कम से कम जहाँ तक हमारी विदेश नीति का संबंध है, कभी-कभी हम जोश में आ सकते हैं, कभी धोका भी हो सकता है।"

समय के साथ अनेक कारणों से जनसंघ पार्टी का दिपक बुझ गया और जनता पार्टी का उदय हुआ। मोरार जी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी जिसमें अटल जी विदेश मंत्री बनाये गये। विदेश मंत्री के रूप में अटल जी ने जो कार्य़ किये वो किसी कीर्तिमान से कम नही है। विदेश मंत्री के रूप में अटल जी ने चीन और पाकिस्तान की यात्राएं की थी। पासपोर्ट की नीति में काफी उदारता दिखाई थी। जनता पार्टी की सरकार सुचारु रूप से कार्य कर रही थी किन्तु कुछ राजनेताओं द्वारा दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाया गया और जनता सरकार भंग हो गई तथा इसी के साथ जनता पार्टी टूट गई। तब अडवानी जी और अटल जी ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। अटल जी के नेतृत्व में नये उत्साह के साथ पार्टी को गति मिली। पार्टी का भले ही नाम बदला किन्तु अटल जी का राजनीति सफर वसुधैव कुटुंबकम की भावना लिये अनवरत चलता रहा। 

राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रहरी अादरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को 1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद’ एवं 1998 में सबसे ईमानदार व्यक्ति के रूप में सम्मानित किया गया है। अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् 1997 में पहली बार प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली। 19 अप्रैल, 1998 को पुनः प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में 13 दलों की गठबन्धन सरकार ने पाँच वर्षों में देश के अन्दर प्रगति के अनेक आयाम छुए।

आज भले ही आदरणीय अटल जी राजनीति जीवन से दूर हैं। परंतु देश के अंदर जागरण का शंखनाद करने वाले अटल जी का व्यक्तित्व, विरोधी को भी साथ लेकर चलने की भावना और उनके ओजस्वी भांषण का कोई विकल्प नही है। आदरणीय अटल की कही पंक्तियों से कलम को विराम देते हैं और उनका शत्-शत् वंदन तथा अभिनंदन करते हैं।

"मेरी कविता जंग का एलान है, पराजय की प्रस्तावना नही। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नही, जूझते योद्धा का जय-संकल्प है। वह निराशा का स्वर नही, आत्मविश्वास का जयघोष है।" 

वंदे मातरम् 
सभी पाठकों को क्रिसमस की हार्दिक बधाई

नोट- पूर्व पोस्ट पढने के लिए निचे दिये लिंक पर क्लिक करें
उच्च कोटी के वक्ता (अटल बिहारी वाजपेयी)

जन जन के प्रिय नेता संवेदनशील अटल जी
  







Friday, 19 December 2014

कोशिश करने वालों की हार नही होती



आज भले ही प्राइवेट क्षेत्र में अच्छे वेतन के ऑपशन्स हैं फिर भी आईएएस या अन्य उच्च पदों के प्रति आकर्षण बरकरार है। अक्सर मुझसे कई विद्यार्थी ये पूछते हैं कि, हमें सफलता कैसे मिले या हम क्या करें कि एक्जाम(Exam) क्लियर(Clear) करलें। बात विद्यार्थी की करें या किसी भी क्षेत्र में कामयाबी की। मित्रो, सच तो ये है कि,  हम सब अपने-अपने क्षेत्र में कामयाब होना चाहते हैं। उसके लिये हमें सबसे पहले अपने लक्ष्य को निर्धारित करना होगा और साथ ही आसमान छुने का हौसला रखना होगा क्योकि सफलता सरलता से नही मिलती।  रास्ते में जानी अनजानी अनेक बाधाएं सूरसा के मुहँ की तरह आपकी बुद्धिमता और धैर्य की परिक्षा लेने के लिये मिलती रहेंगी। समस्याओं का सामना करने का हौसला रखें और चल पङिये अपनी मंजिल की ओर।

जिस तरह पानी में रहने के लिये तैरना आना अनिवार्य शर्त है उसी तरह हम जिस क्षेत्र में जाना चाहते हैं, उसके विषय ज्ञान का पूर्णता से अध्ययन करना सफलता की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।  लक्ष्य पाने के लिये लगातार परिश्रम करने का जज़बा इतना स्ट्रॉग(Strong) हो कि, आपके द्वारा किये गये प्रयासों से लक्ष्य करीब आ जाये। 

स्वामी विवेकानंद ने कहा है, "उठो जागो और तब तक मत रुको,
                                         जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।" 

मित्रों, जिंदगी की सामान्य धारा में बहकर कोई सफल नही होता। धारा चाहे जिस भी दिशा में बहे हमें अपने लक्ष्य के अनुसार बहने की ही कोशिश करनी चाहिये। स्वंय को परिस्थिती की दुहाई देकर धारा के हवाले करना कायरता है। अच्छे प्रयोजन में आनेवाली बाधाएं तो हमें अपने लक्ष्य के प्रति और दृणता प्रदान करती हैं क्योकि जितना कठिन परिश्रम होगा जीत उतनी ही शानदार होगी। नकारात्मक आदतें हमारी सफलता की सबसे बङी दुश्मन है। थोङी सी असफलता से डरकर  कुछ लोग पहले से ही मन बना लेते हैं कि उनका लक्ष्य पूरा हो ही नही सकता। उन्हे विश्वास होता है कि, वो चाहे कुछ भी करें उनका परिश्रम काम नही आयेगा। ऐसे लोग मैदान में जाने से पहले ही हार मान लेते हैं लेकिन सफलता के सपने देखते
 हैं। सोचिये!  रात में कभी सूरज उग सकता है इसलिये सफलता को रौशन करने के लिये सबसे पहले नकारात्मक सोच को अलविदा कहें क्योकि असफलता में भी सफलता का पैगाम होता है। कार्य के दौरान कभी-कभी गलतियाँ हो जाती है, ये गलतियाँ तो हमें ये एहसास कराती हैं कि हमने कोशिश की। 

मित्रों, दौङ प्रतियोगिता में जब हम किसी खिलाङी को स्वर्ण पदक लेते देखते हैं, तो सोचते हैं कि 10 -15 मिनट की दौङ से इसे ये सम्मान मिल गया किन्तु सच्चाई में उसके 10-15 वर्षो की कङी मेहनत का परिणाम होता है स्वर्ण पदक, जिसको पाने के लिये वो दौङते समय कितनी बार गिरा होगा और फिर लक्ष्य को याद करके पुनः दौङा होगा। ऐसे ही लगातार कोशिश से ही लक्ष्य प्राप्त होता है। इसलिये सफलता के बारे में सोचें, अपना लक्ष्य निर्धारित करें और उसके लिये मेहनत करें। धारा के अनुकूल न बहें, बल्कि धारा में बहने का हौसला रखें क्योकि........

"लहरों के डर से नौका पार नही होती, 
कोशिश करने वालों की हार नही होती। 
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकीर करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो। 
कुछ किये बिना ही, जय जयकार नही होती। 
कोशिश करने वालों की हार नही होती।" 
आदरणिय हरिवंश राय बच्चन जी की कविता की कुछ पंक्तियों से कलम को विराम देते हैं। 
Best of  Luck

Friday, 12 December 2014

मानवता मेरा धर्म है (Humanity is my Religion)


आजकल किसी भी न्यूज चैनल को देखें हर चैनल पर धर्म और जाति के विषय पर गरमा-गरम बहस देखी जा सकती है। मन में ये प्रश्न उठता है कि, जिस धर्म में मानविय गुणं न हो और इंसान का इंसान के प्रति सम्मान न हो, ऐसी जाति एवं धर्म से किसका भला होगा। किसी भी समाज या देश का विकास सबके सहयोग पर निर्भर है, फिर हम क्यों धर्म और जाति के नाम पर अपने विकास पर कुठाराघात कर रहे हैं ????

इतिहास गवाह है कि, ऊची जाति की अस्पृश्यता, आडम्बर, अनेक देवी-देवता, इस्लाम और ईसाइयों के कट्टर अत्याचार की नीति तथा क्रूर व्यवहार के कारण लाखों स्त्री-पुरुष धर्म परिर्वतन के लिये मजबूर हुए। भारत पर धर्म और जाति के नाम पर अनेक अमानविय आक्रमण हुए, जिसने भारत की आत्मा को तार-तार कर दिया। आज भारत ही नही विश्व के कई देश धर्म और जाति के वायरस से ग्रसित हैं और विनाश की ओर अग्रसर हैं। यहाँ तक कि एक ही धर्म इस्लाम में सिया सुन्नी का झगङा तो कहीं देवी-देवताओं के नाम पर हिन्दुओं में विवाद। आज वक्त का तकाज़ा है कि, इतिहास से सबक लेकर हमें धर्म और और जाति के चक्कर में न पङते हुए मानवीय सोच का संचार करना चाहिये। 

जाति और धर्म के नाम पर की गई व्यवस्था अप्रजातांत्रिक है, इससे समानता की भावना पर कुठाराघात होता है। कहने को तो  कोई भी सरकार जाति व्यवस्था और धार्मिक उन्मादों को भारत से दूर करना चाहती है, ताकि सभी लोग समान रूप से जीवन व्यतीत करें किन्तु जाति के नाम पर आरक्षण की नीति अपने आप में बहुत बङी त्रासदी है। सच तो ये है कि, धर्म और जाति के नाम पर टकराव सिर्फ विभिन्न राजनैतिक दलों की वोट नीति है और दंगो की उपज का एक विभत्स कारण मात्र है। 

"Every Religion that has come into the world has brought the message of love & brotherhood. Those who are indifferent to the welfare of their fellowmen, whose heart are empty of love, humanity & kindness, they do not know the meaning of Religion." 

अनंततः यही कहना चाहते हैं कि, विकास के इस दौर में परिवर्तन के बिना प्रगति की आशा करना व्यर्थ है अतः हमें अपनी सोच और विचार में परिवर्तन का आगाज करना होगा, जहाँ हम सबको इंसानियत की जाति और मानवता के धर्म में इस तरह रच-बस जाना है कि, हर ओर सुख-शान्ति की बयार बहे, बेटियाँ सुरक्षित हों और देश का चहुमुखी विकास हो। कवि प्रदीप की पंक्तियाँ साकार हो जाये....


"इन्सान से इन्सान का हो भाई चारा, यही पैगाम हमारा

संसार में गूँजे समता का इकतारा, यही पैगाम हमारा।"



Wednesday, 10 December 2014

कैलाश सत्यार्थी एवं मलाला को बधाई



साहस के प्रतीक मलाला एवं कैलाश सत्यार्थी को शांती के नोबल पुरस्कार की हार्दिक बधाई। ये वो नायक हैं जिन्होने अपनी जिंदगी की परवाह किये बिना समाज को एक नई दिशा दी है। कम उम्र के बावजूद मलाला लङकियों की शिक्षा के लिये लगातार प्रयास कर रहीं हैं। मलाला ने पाकिस्तान जैसे देश में बाल अधिकारों एव बालिका शिक्षा के लिये अपना संर्घष जारी रखा है। अक्टुबर 2012 में मात्र 14 वर्ष की अल्पआयु में अपने उदारवादी प्रयासों के कारण वे तालिबानी फरमान की शिकार बनी। आँखों में डॉक्टर बनने का सपना लिये मलाला स्कूल जाती थी परंतु उसके सपने को तालिबानियों के फतवे ने विराम लगा दिया। तालिबानियों ने लङकियों के लगभग 200 स्कूलों तोङ  दिये किन्तु मलाला के इरादों को वे रोक न सके। जानलेवा हमले के बावजूद मलाला आज भी हिमालय की तरह अपने इरादे पर मजबूती से खङी है। आज भी वे बालिका शिक्षा की पक्षधर है और समाज में शिक्षा के नये आयाम को चरितार्थ कर रही हैं। सबसे कम उम्र में नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाली मलाला ने सिद्ध कर दिया है कि, 
मुश्किलों से भाग जाना आसान होता है, 
हर पहलु जिंदगी का इम्तिहान होता है,
डरने वालों को मिलता नही कुछ ज़िंदगी में,
लङने वालों के कदमों में ज़हान होता है। 

तंग गलियों से निकलकर विश्व पटल पर छा जाने वाले कैलाश सत्यार्थी बाल अधिकारों के लिये 1980 में इलेक्ट्रीकल इंजिनियर की नौकरी छोङकर अब तक 80 हजार बाल मजदूरों को रिहा करा चुके हैं। कई बार असामाजिक तत्वों ने उनपर जानलेवा हमला किया और धमकाया भी परंतु दृण इच्छाशक्ति लिये कैलाश सत्यार्थी अपने मिशन को आगे बढाते रहे। बाल मजदूरी के समाप्ति हेतु अनेक पद यात्राएं करके जनमानस को जागृत करने का प्रयास किये। मजबूत कानून की माँग करते हुए 1993 में बिहार से दिल्ली तक की पदयात्रा, 1994 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक की यात्रा, 1995 में कोलकता से काठमांडू तक की यात्रा और 2007 में बाल व्यपार विरोधी दक्षिण एशियाई यात्रा प्रमुख है। शिक्षा को मौलिक अधिकार दिलाने में भी कैलाश सत्यार्थी का महत्वपूर्ण योगदान है। 

मध्यप्रदेश के गौरव कैलाश सत्यार्थी पहले गैर सरकारी व्यक्ति हैं जिन्हे संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन को संबोधित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। कैलाश सत्यार्थी का एनजीओ बाल श्रम और बाल तस्करी में फंसे बच्चों को मुक्त कराने का मानवीय प्रयास कर रहा है। नोबल कमेटी के अनुसार 'बचपन बचाओ आंदोलन' चलाने वाले सत्यार्थी ने गाँधी जी की परंपरा को कायम रखा है। भारत को विशवपटल पर गौरवान्वित करने वाले कैलाश सत्यार्थी के लिये ये कहना उचित होगा कि, 

आँधियों को जिद्द है जहाँ बिजली गिराने की,
कैलाश सत्यार्थी को जिद्द है वहाँ आशियाँ बसाने की।
हिम्मत और हौसले बुलंद हैं,
मानवता की मशाल जलाने के लिये जंग अभी जारी है। 

ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, 2014 का शांति के लिये नोबल पुरस्कार सौहार्द का प्रतीक है। मलाला और कैलाश सत्यार्थी के मिशन में मानवता की इस मशाल को प्रज्वलित रखना हम सबकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी है।     

धन्यवाद 


Sunday, 30 November 2014

विकलांगता अभिशाप नही है


हमारे समाज में प्रचलित चलन के अनुसार हम किसी योजना या किसी आन्दोलन की, शुरुवात तारीख को प्रतिवर्ष उस दिन उसकी याद में पूरी शिद्दत से मनाते हैं और तो और उस आयोजन के उद्देश्य को भी याद करते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए हम 1992  से 3 दिसम्बर को प्रतिवर्ष विकलांगता दिवस मनाते हैं। इस दिन कई तरह के सांस्कृतिक तथा खेलकूद से संबन्धित कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, रैलियाँ निकाली जाती है तथा सरकार द्वारा शारीरिक अक्षम लोगों के हित के लिये कई लाभकारी योजनाओं की भी घोषणां की जाती है। विकलांगता दिवस मनाने का उद्देश्य है कि, आधुनिक समाज में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के साथ हो रहे भेद-भाव को समाप्त करना तथा शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास करना। इसी के तहत 2013 के विकलांगता दिवस का थीम था, बंधनो को तोडो. दरवाजों को खोलो अर्थात सभी का विकास समावेशी समाज में।

वास्तविकता तो ये है कि हम वर्ष के सिर्फ एक दिन उस दिवस के उद्देश्यों और आदर्शों को बहुत शिद्दत से मनाते हैं लेकिन अगले ही दिन हम उन आदर्शों और उद्देशों को भूल जाते हैं। हमसब अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं। जबकी खास तौर से विकलांगता दिवस का उद्देश्य तभी सार्थक हो सकता है जब हम सिर्फ एक दिन नही वरन वर्ष के सभी दिन उन्हे अपने समाज का हिस्सा माने और उनके साथ सहयोग की भावना रखें।

आज हमारा देश भारत विकासशील देश की श्रेंणी में है।  हमने विज्ञान में अनेक कीर्तिमान रचे हैं, हाल ही में हम मंगल पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। परंतु अभी भी हम भेद-भाव के वायरस को समाप्त नही कर सके हैं। मित्रों,  शारीरिक अक्षमता जन्मजात भी हो सकती है और दुर्घटना की वजह से भी हो सकती है, परंतु जिस विकलांगता का उन्हे एहसास कराया जाता है वो हमारे समाज की विकलांग मानसिकता को ही दर्शाती है।

यदि हम दृष्टिबाधित लोगों की बात करें तो उन्हे सबसे पहले अपने परिवार वालों की ही उपेक्षा का शिकार होना पङता है क्योंकि कई परिवार तो इस डर से कि, समाज में कोई क्या कहेगा या परिवार के बाकी बच्चों का विवाह कैसे होगा जैसे कारणों की वज़ह से दृष्टीबाधितों को छुपाकर रखते है या उन्हे किसी संस्था में छोङ कर दुबारा उनकी तरफ देखते भी नही। बहुत कम खुशनसीब दृष्टीबाधित बच्चे हैं जिनका परिवार उनके साथ होता है। मित्रों, ऐसी उपेक्षित परिस्थिति में दृष्टीबाधित बच्चों का सकल विकास कैसे संभव हो सकता है?

हमारी प्रचलित मान्यताएं और रुढीवादी विचारधारा इस परेशानी में आग में घी का काम करती हैं। वर्षों पहले तक अक्षम बच्चों को अपमान जनक समझा जाता था। दृष्टीबाधिता को सजा का प्रतीक समझा जाता था। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि आज भी समाज के कुछ वर्ग में ये मनोवृत्ति व्याप्त है कि अंधापन उनके पूर्व जनम के पाप की सजा है या उनके माँ-बाप के अनुचित कार्यों का ही परिणाम है। आज समय के साथ शिक्षा के विस्तृत ज्ञान ने सामाज की अवधारणा को थोङा परिवर्तित जरूर किया किन्तु आज भी अंधापन सजा की परिभाषा से निकलकर दयाभाव, भिक्षादान के जाल में उलझ गई है। जिसमें अक्सर मानवतापूर्ण सहानुभूति का अभाव नजर आता है। सच्चाई तो ये है कि यदि हम दृष्टीबाधित बच्चो को भी उचित सहयोग और अवसर प्रदान करें तो वो भी आत्मनिर्भर बनकर देश के विकास में अपना योगदान दे सकते हैं क्योकि विकलांगता कोई अभिशाप नही है।

मदर टेरेसा के अनुसार, "महत्वपूर्ण ये नही है की आपने कितना दिया, बल्कि महत्वपूर्ण ये है कि देते समय आपने कितने प्यार से दिया।" 

विकास के इस दौर में आप सबसे अनुरोध है कि, हम सब मिलकर दृष्टीबाधित बच्चों के लिये मानवीय भावना से ओत-प्रोत एक ऐसे आसमान की रचना करें, जिसकी छाँव में दृष्टीबाधित बच्चे सकारात्मक सहयोग और स्वयं के प्रयास से आत्मनिर्भर बन सकें। मित्रों, दृष्टीबाधितों के विकास में हम उनकी शैक्षणिक पाठ्य सामग्री को रेकार्ड करके, परिक्षा के समय सहलेखक (Scribe) बनकर  तथा चिकित्सा आदि के माध्यम से अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। हम सबकी सामाजिक चेतना के सहयोग से, दृष्टीबाधित बच्चों में भी आत्म-सम्मान से जीने की भावना का विकास होगा, जो किसी भी समाज और देश के लिये हितकर होगा। समाज की प्रथम ईकाइ परिवार के भावनात्मक सहयोग और हम सबके मानवीय दृष्टिकोंण  से दृष्टीबाधितों को जो सुरक्षित और आशावादी क्षितिज प्राप्त होगा उसकी मधुर एवं संवेदनशील छाँव में ये बच्चे निश्चय ही विकास की इबारत लिखेंगे।  निःसंदेह हम सबके साथ से विकलांता दिवस  सार्थक और सफल बन सकता है।

"Children with Disabilities are like Butterflies with a broken wings. They are just as beautiful as all others, But they need help to spread their Wings" 

नोटः- कई दृष्टिबाधित समाज की मानवीय जागरुकता और पारिवारिक सहयोग से आत्मनिर्भरता के साथ समाज में अपना विशेष स्थान बनाने में सफल हुए हैं। सकारात्मक दृष्टिकोंण लिये ऐसे ही लोगों के बारे में दिये गये लिंक पर क्लिक करके अवश्य पढें।

अंधेरी दुनिया में हौसले की रौशनी

आत्मनिर्भर बनने की इच्छा को दृष्टिबाधिता भी रोक न सकी

धन्यवाद 




Tuesday, 18 November 2014

परिवार जिंदगी का आधार है


हमारी सुरक्षा का महत्वपूर्ण घेरा परिवार होता है, जो बाहर ( परि) के आक्रणम (वार) से हमें बचाता है। ये ऐसा समूह है जहाँ प्यार और सपोर्ट के अनुभवों की चेन में हमसब बंधे होते हैं।  हम सब की खुशी का आधार है परिवार। परंतु  एक सच्चाई ये भी है कि जब हम पारिवारिक जीवन में प्रवेश करते हैं तो कई समस्याओं का भी सामना करना पङता है। सबसे प्रमुख समस्या होती है आर्थिक जिम्मेदारी जिसकी वजह से कई बार परिवार के पुरूष सदस्य को घर से दूर रोजगार की तलाश में जाना पङता है, जिसे खास तौर से मध्यम वर्गीय या निम्नवर्गीय परिवारों को अधिक झेलना पङता है। वैसे यदि गहराई से विचार किया जाये तो आर्थिक समस्या इतनी बङी भी नही है कि, जो परिवार की खुशहाली को ग्रहंण लगा सके क्योंकि भौतिक सुविधा की कोई सीमा नही है वो तो हमारे ऊपर निर्भर है कि हम किसे और कितना महत्व दे रहे हैं। आज भले ही भौतिकवाद का जमाना हो किन्तु जीवन की वास्तविक खुशहाली आपसी प्रेम और सहयोग पर ही अंकुरित होती है।

प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तु का कहना है कि, "परिवार किसी भी राज्य की पहली ईकाइ है। ये राज्य के विकास की पहली मंजिल का पङाव है। परिवार मनुष्य की शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ती करने वाली पहली संस्था है।" 

मनोवेज्ञानिकों की यदि माने तो कई ऐसे परिवार हैं जो कम धन में भी खुश हैं उनके बच्चे भी अपनी प्रतिभा के बल पर अपना और अपने परिवार का नाम रौशन करते हुए सुखी और संपन्न हैं क्योकि उनके पास संतोष का पंरम धन है। किसी ने सच कहा है कि 'संतोषी सदा सुखी'. वहीं दूसरी ओर कई ऐसे साधन सम्पन्न परिवार हैं जहाँ समस्त भौतिक साधन हैं फिरभी वे अवसाद में चले जाते हैं। वास्तव में परिवार की खुशहाली तो चार स्तंभ पर टिकी होती है, वो हैं प्यार, विश्वास, सम्मान और आपसी समझदारी। परिवार के इन आधारों की नींव जितनी मजबूत होती है उतनी ही मजबूत रिश्तों की भी डोर होती है। जिस तरह पाँचों अँगुली एक बराबर नही होती फिर भी एक साथ मिलकर जब मुठ्ठी बन जाती है तो अच्छों अच्छों की छुट्टी कर देती है, उसी प्रकार परिवार में सभी लोगों की विचारधारा एक नही होती किन्तु जब वे परिवार के सुर में अपना विचार व्यक्त करते हैं तो दुनिया की कोई भी ताकत उनसे उनकी खुशी नही छीन सकती। परिवार तो संगीत की तरह है जिसके कुछ स्वर नीचे तथा कुछ स्वर ऊंचे लगते हैं लेकिन इसी संगीत के मिल जाने से सुंदर गीत बनता है। परिवार तो ऐसा मधुर केंद्र बिन्दु है जहाँ व्यक्ति, जिंदगी की जद्दोज़हद और तनाव को बच्चों की किलकारी में भूल जाता है। अपने अभिभावक से मिले स्नेहशील आशिर्वाद के साथ पुनः जिंदगी की दौङ में शामिल हो जाता है।  

"Family is like branches on a tree, we all grow in different directions, yet our roots remain as one."

परिवार तो ईश्वर का सुंदर वरदान है जहाँ जिंदगी की शुरुआत प्यार और अपनेपन के पोषण से पल्लवित होती है। खुशहाल परिवार समाज और देश को भी सुखी और सम्पन्न बनाता है। मनु संहिता पर आधारित  हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता में भी परिवार को सर्वोपरी माना गया है। परंतु यदि आज के परिपेक्ष्य में  देखें तो हर तरफ, हर जगह बेशुमार इंसान नजर आते हैं फिर भी कहीं न कहीं परेशानियों और तनहाईयों का शिकार है इंसान, ऐसे में मदर टेरिसा का कहना है कि, What can you do to promote word peace? Go home & love your Family. आज भले ही वक्त के तराजू पर एकल परिवार का पलङा भारी हो गया हो फिर भी परिवार के महत्व का पलङा सदैव भारी रहेगा क्योंकि जिंदगी का आधार परिवार ही है। 

किसी भी बच्चे के लिये परिवाार तो वो प्रथम पाठशाला है जहाँ बच्चा आपसी सहयोग और सम्मान का ककहरा पढता है। जिंदगी का पहला कदम अपनो के दुलार और आशीष के साथ आगे बढाता है। मेरी नजर में परिवार तो वो सुंदर कल्पना है जहाँ खून के रिश्ते ही नही वरन दोस्त और पङोसी भी सब मिलकर परिवार की तरह  रहते हुए सहयोग और भाईचारे के पैगाम से चारों दिशाओं को गुंजायमान करते हैं। परिवार और दोस्त तो वो छुपा हुआ खजाना हैं, जो हमें आंनदित करते हैं और धनवान बनाते हैं। परिवार तो किसी परी की जादू की छङी की तरह है, जिसके जादू से जिंदगी की सभी बाधाएं और मुश्किलें छुमंतर हो जाती हैं। परिवार में जो खुशी मिलती है वो अमुल्य है उसका कोई विकल्प भी नही होता।    

सच्चाई तो यही है कि,  "Family is one of the strongest words any one can say because the letter of family means father & mother I love you." 

Thank you God for my Family. Keep them safe.

Sunday, 9 November 2014

भारत अपडेट हो गया


पिछले सप्ताह काफी वर्षों बाद मैं अपने मित्र से मिलने भारत आया। एयरपोर्ट पर मित्र ने कार भेज दी थी, जिससे उसके घर की ओर निकल चला। रास्ते में शहर की तरक्की देखकर खुशी भी हुई एवं आश्चर्य भी हुआ, खैर जैसे ही मित्र के घर पहुँचा उसके नौकर ने अभिवादन करते हुए कहा कि आप चाय नाश्ता लेकर आराम किजीये साहब थोडी देर से आयेंगे। तभी मित्र का विडियो कॉल आया और कहने लगा sorry  यार थोडी देर हो जायेगी तु आराम कर। मैं जब तक कुछ बोलता फोन कट हो गया।

मै पुरानी यादों  में चला गया, सोचने लगा कि पहले तो मुझे लेने एक घंटे पहले एयरपोर्ट पहुँच जाता था।  अब इतना व्यस्त है की कार भेज दी, खैर मेने सोचा कम से कम फोन तो किया भले ही मुझसे यात्रा के बारे में कुछ नही पूछा। रात के खाने पर मित्र से मुलाकात हुई, जनरल बातों के बाद मैने मित्र से कहा कि यहाँ बहुत कुछ बदल गया है, लोग छतों पर नही दिखते। 

मित्र बोला छत अब हैं कहाँ ऊंची-ऊंची इमारतों ने छत की संस्कृति को दूर कर दिया है। मेरे भाई; आज बमुश्किल लोगों को सर पर छत नसीब हो रही है और तुम हो की खुली छत की बात कर रहे हो। मैने कहा मैं पूरे दिन यहाँ रहा, पहले जैसे तुम्हारे पढोसी मिलने नही आए! मित्र बोला क्या बात करते हो! किस दुनिया में हो, फेसबुक के जमाने में फेस टू फेस बात करने का टाइम किसके पास है।

मैने कहा जब मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था तो 8बजे  मेरा मन हुआ कि बाहर बगीचे में चलें वहाँ जरूर कोई मिलेगा परंतु बाहर बगीचे में भी कोई नही मिला, वो सामाजिकता, मिलना जुलना सब कहीं खो गया है। मित्र बोला सामाजिकता तो अभी भी है, कुछ लोग निशा के कजिन से मिलने गये होंगे तो कुछ लोग महादेव के दर्शन कर रहे होंगे।  देश-दुनिया की चिंता करने वाले लोग राजनैतिक बहस में शामिल होने गये होंगे। मैने कहा परंतु बाहर तो कहीं भी कोई आता-जाता नही दिखा।

मित्र हँसते हुए बोला , कैसे नजर आयेंगे! कोई ड्राइंग रूम में तो कोई लिविंग रूम में 24 या 32 इंच के एल सी डी के सामने बैठकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को निभा रहा होगा। मैने बीच में ही टोकते हुए कहा, अरे यार मैं तुझे एक बात बताना तो भूल ही गया शाम को जब बाहर टहल रहा था तो अपना अजय दिखा, देखते ही कहने लगा कब आये? जब तक मैं कुछ बोलता पूछने लगा वाट्सअप पर हो, नम्बर क्या है? जैसे ही मैने नम्बर बताया, पता नही कितनी जल्दी में था मुस्कराते हुए bye करके चला गया। मित्र मुस्कराते हुए बोला भारत अपडेट हो गया, हम मंगल पर पहुँच गये हैं और तुम अभी पुराने भारत को ही ढूंढ रहे हो।

मैने आश्चर्य से कहा, लेकिन तुम्हारे प्रधानमंत्री तो अभी भी रेडियो पर मन की बात करते हैं, दिपावली पर कश्मीर जाते हैं तथा अमेरीका जाकर वहाँ के लोगों को आमंत्रित करके  भारतीय संस्कृति को निभा रहे हैं।  गाँधी जी के सपनो को साकार करने हरिजन बस्ती में भी जा रहे हैं और साफ-सफाई के महत्व को पूरे भारत में पहुँचाने के लिये स्वंय झाडु़ उठाने में भी संकोच नही कर रहे,  माँ गंगा के महत्व को  जन-जन की आवाज बना रहे हैं तो कहीं गॉव का विकास कर रहे हैं और  तुम कह रहे हो कि  भारत अपडेट हो गया।

मित्र बोला, हाँ मैं सच ही तो कह रहा हूँ, भारत अपडेट हो गया हमारे प्रधानमंत्री को मालूम है कि यदि भारत के प्रत्येक व्यक्ति तक अपना वर्चस्व स्थापित करना है तो रेडियो को अपनी आवाज बनानी होगी, टीवी वाले तो स्वंय ही पीछे आ जायेंगे। तुम्हे तो पता ही होगा कि कोकाकोला कंपनी ने भारत की ऐसी-ऐसी जगह पर कोकाकोला बेचा जहाँ बिजली भी नही आती इसी लिये तो दो बार दिवालिया घोषित होने पर भी आज बङी कंपनी में गिनी जाती है और अच्छा कारोबार कर रही है। तुम अभी हमारे प्रधानमंत्री को जानते नही वो बाजू में IIM लेकर घूमते हैं और तो और हमारे प्रधानमंत्री  अपनी कंपनी यानि की पार्टी के CEO भी तो हैं। कश्मीर की बात करते हो, क्या तुमने देखा नही महाराष्ट्र और हरियाणां में पहली बार भाजपा आगई; आशा करते हैं दूरदर्शिता तुम्हे समझ में आगई होगी।

मैने कहा ये तो अच्छी बात है, अपनी पार्टी का कर्ज तो अदा कर रहे हैं वरना कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होने वसियत में मिली पार्टी को ही निगल लिया। मित्र बोला, कौन किसका कर्ज अदा कर रहा है मैं ये तो नही जानता लेकिन एक बात ये जरूर जानता हुँ कि पेट्रोल डीजल के दाम कम होने से हम जनता को जरूर राहत महसूस हो रही है।

मेरे और मित्र के बीच बात करते हुए कब सुबह हो गई पता ही नही चला। ये सुबह मेरे लिये नई जरूर थी किन्तु अपनी भारतीय संस्कृति की खुशबु के साथ थी। आज हमारी सामाजिक संरचना पहले से अपडेट हो गई है, पहले से कहीं अधिक संख्या में दामिनी के साथ खङी होती है तो कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ एक साथ विरोध करती दिखती है। पलभर में फेसबुक,ट्युटर और वाट्सअप के जरिये फेस टू फेस नजर आती है। परिवर्तन तो जीवन का चक्र है और विकास का सूचक भी, यदि इस विकास में हम अपनी वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति से भी जुङे हुए हैं तो ये अपडेट सोने में सुहागा है। इन्ही अच्छी यादों के साथ मैंने अपने कार्यक्षेत्र की ओर वापसी की....... 

धन्यवाद 



Wednesday, 5 November 2014

आत्मनिर्भर बनने की इच्छा को दृष्टीबाधिता भी रोक न सकी.....

अक्सर हम लोग पढाई के दौरान या कैरियर बनाते समय किसी न किसी ऐसी महान विभूति के जीवन के बारे में पढते हैं जिससे हमें प्रेरणा मिलती है। भले ही हम उन्हे व्यक्तिगत रूप से न जानते हों फिर भी उनके अनुभव से हम रास्ते में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को दूर कर पाते हैं। विवेकानंद जी की बात करें या ए.पी.जे. अब्दुल्ल कलाम साहब की, ये विभूतियाँ आज भी अनेक लोगों के लिये आदर्श हैं। मेरे लिये भी ये आदर्श एवं प्रेरणा स्रोत हैं। इसके साथ ही मुझे कुछ ऐसी बच्चियों से भी प्रेरणा मिलती है, जिनके साथ हम कुछ शैक्षणिंक कार्यक्रमों के कारण जुङे। आज हम जिन बालिकाओं के बारे में बात करने जा रहे हैं वो भले ही लाखों लोगों के लिये प्रेरणास्रोत न हों किन्तु मेरे लिये एवं उन जैसी ही अन्य दूसरी बालिकाओं के लिये सफल प्रेरक हैं। इंदौर की रश्मि चौरे और रजनी शर्मा ऐसी बालिकाएं हैं जिन्होने, हर विपरीत परिस्थिति में धैर्य के साथ सकारात्मक दृष्टीकोंण लिये आत्मनिर्भर बनने की इच्छा को साकार करने में सफल हुईं हैं।

मित्रों, रश्मि और रजनी के जीवन का सफर इतना आसान नही है क्योंकि ईश्वर ने इन्हे बनाने में थोङी कंजुसी कर दी है। ये बालिकाएं दृष्टीबाधिता के बावजूद  अपनी दृणइच्छा शक्ति (Will Power) के बल पर सफलता के सोपान पर पहला कदम रख चुकी है अर्थात आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गईं हैं। इनके जीवन का सफर आसान तो बिलकुल भी नही था क्योंकि यदि विज्ञान की माने तो ज्ञानार्जन का 80%  ज्ञान हमें आँखों द्वारा ही होता है। अपनी इस कमी के बावजूद इन बच्चियों ने जहाँ चाह है वहाँ राह है कहावत को चरितार्थ किया है। सोचिये! जहाँ हम आँख पर पट्टी बाँध कर चार कदम भी नही चल पाते वहाँ ये बालिकाएं जीवन के 22-23 वर्षों को पार करते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ रही हैं।

रशमि ने राजनीति शास्त्र से एम.फिल किया है, सपना है प्रोफेसर बनने का किन्तु उसकी एक विचार धारा ये भी है कि अन्य विधाओं की प्रवेश परिक्षा भी देते रहना चाहिये। वे प्रवेश परिक्षाओं हेतु पढाई भी करती रहती है। एम.फिल. के दौरान ही उसका चयन बैंक में हो गया। आज उसकी नियुक्ति इंदौर में युनियन बैंक की मुख्य शाखा में हो गई है। जन्म से ही रशमि को दृष्टीबाधिता की शिकायत थी। जैसे-जैसे बङी हुई तो छोटी बहन को स्कूल जाते देख बहुत रोती। ऐसा नही था कि माता-पिता पढाना नही चाहते थे किन्तु इटारसी जैसी जगह पर जहाँ सुविधाएं कम हों वहाँ दृष्टीबाधितों के लिये पढना तथा आगे बढना, किसी एवरेस्ट पर चढने से कम नही होता। समाज की उदासीनता भी ऐसी परेशानियों को और बढाने का ही काम करती हैं। ऐसे में रश्मि की दादी ने बहुत जागरुकता दिखाई वे कई स्कूल गईं वहाँ वे अध्यापकों से मिन्नत करती कि मेरी पोती को विद्यालय में बैठने दो, आखिरकार उनका प्रयास रंग लाया और एक विद्यालय ने रश्मि को एडमिशन दिया। जहाँ वे मौखिक शिक्षा ग्रहण करने लगी। रश्मि का पढाई के प्रति  आर्कषण देखकर उसके पिता उसे इंदौर में दृष्टीबाधित संस्था  में दाखिला करा दिये। जहाँ उसने ब्रेल लीपी का विधिवत अध्ययन किया। 8वीं के बाद सामान्य बच्चियों के साथ सरकारी स्कूल में पढी तद्पश्चात कॉलेज में उच्च अध्ययन के लिये गई। 9वीं से एम.फिल. तक की शिक्षा सामान्य छात्रों के साथ ही हुई। अध्ययन के दौरान नाटक, वाद-विवाद तथा नृत्य जैसी विधाओं में अनेक पुरस्कार प्राप्त करके स्वयं का एवं संस्थान का गौरव बढाया। परिवार की जागरुकता और रश्मि का हौसला सफल हुआ। असंभव को संभव करते हुए आत्मनिर्भर की चाह का अंकुरण हुआ, जो आज भी रश्मि की सकारात्मक सोच और दृणइच्छाशक्ति से पल्लवित हो रहा है।

रश्मि के बारे में पढते समय आपके मन में ये अवश्य आया होगा कि बैंक में तो रुपये का लेन-देन होता है, वहाँ दृष्टीबाधित लोग कैसे काम करेंगे। मित्रों, आज विज्ञान ने बहुत तरक्कि कर ली है। कोई भी शारीरिक अक्षमता किसी भी कार्य क्षेत्र में बाधा नही है। यदि मन सक्षम और दृणं है तो रास्ते तो विज्ञान ने बना दिये हैं। सच तो ये है कि यदि हम असफल होते हैं तो अपनी मानसिक विकलांगता के कारण। यदि बात करें रशमी की तो उसकी नियुक्ति युनियन बैंक की मुख्य शाखा में हुई है। यहाँ वो सीधे तौर पर बैंक ग्राहंको से नही जुङी है। उसका कार्य़ क्षेत्र बैंक की अन्य शाखाओं के साथ है। जॉज़ 13,14 और 15 जैसे सॉफ्टवेयर के माध्यम से वे अपने कार्य को सुचारु रूप से कर रही है। प्रवेश परिक्षा में पास होने के बाद उसे लखनऊ में बैंक के कार्य संबन्धित ट्रेनिगं दी गई। जहाँ सामान्य बालक-बालिकाओं के साथ रश्मि जैसे ही 35 बच्चे थे, जिनकी नियुक्ति अलग-अलग बैंकों में हुई।  

अब बात करते हैं रजनी की, वह भी बहुत होशियार बालिका है। जब वे 12 वर्ष की थी, तब उसे आई.टी.पी. बिमारी हुई जिसमें रक्त में प्लेटलेट्स कम हो जाती है और शरीर की कमजोर नसों से रक्त बहने लगता है। इस बिमारी का प्रकोप उसके आँखों पर हुआ, आँख के अंदर की रक्तवाहिकाओं के फटने से उसकी आँखों के परदे पर खून जम गया और उसे दिखना बंद हो गया। 
(Idiopathic thrombocytopenic purpura (ITP) is a disorder that can lead to easy or excessive bruising and bleeding. The bleeding results from unusually low levels of platelets — the cells that help your blood clot .Idiopathic thrombocytopenic purpura, which is also called immune thrombocytopenic purpura, affects both children and adults. Children often develop idiopathic thrombocytopenic purpura after a viral infection and usually recover fully without treatment. In adults, however, the disorder is often chronic.  )

सोचिये! इतनी छोटी सी उम्र में जहाँ सब ठीक चल रहा हो वहाँ अचानक सब कुछ अंधकार में डूब जाये। निःसंदेह वो पल उसके एवं उसके परिवार वालों के लिये अत्यधिक कष्टप्रद रहा होगा। परंतु उसकी स्वंय की हिम्मत और परिवार वालों के साथ से उसे नये रास्ते पर आगे बढने का हौसला मिला। उज्जैन में अधिक सुविधा न होने के कारण रजनी के अभिभावक ने उसका दाखिला इंदौर की दृष्टीबाधित संस्था में करा दिया। पढाई में वो लगभग सदैव अव्वल रही और सामान्य बालिकाओं के साथ पढते हुए भी कक्षा में प्रथम आती रही। उसका ये क्रम विद्यालय तक अनवरत चलता रहा। कविता लिखने के साथ-साथ उसने वाद-विवाद, नृत्य तथा निबंध प्रतियोगिताओं में बहुतायत पुरस्कार अर्जित किये हैं। हिन्दी से एम.ए. प्रथम श्रेंणी में पास करने के बाद प्रशासनिक सेवाओं में जाने की तैयारी कर रही है। इसी दौरान उसकी नियुक्ति देवास में राजस्व विभाग में LDC के पद पर हो गई है। जहाँ उसे मेल चेक करना, लेटर टाइप करना जैसे दायित्व सौंपे गये हैं। संस्था में रहते हुए ही रजनी ने टाइपिंग का कोर्स भी कर लिया था। अपनी बिमारी के दर्द को सहते हुए आगे बढने के लिये सदैव तत्पर है। रजनी का मानना है कि,  भले ही मंजिल हो अभी दूर, वो भी मिलेगी एक दिन जरूर। उसके ऐसे ही सकारात्मक विचारों को उसकी कविता (रौशनी का कारवां) में पढा जा सकता है, जिसे हमने अपने ब्लॉग पर लिखा है। नित नई चिजों को सीखना उसकी आदत में है। वर्तमान में रजनी आंध्र बैंक भोपाल में राज्य भाषा अधिकारी के रूप में कार्यरत है। विपरीत परिस्थिति में भी कामयाबी की संभावनाओं को तलाशते हुए, आज रजनी अपने लक्ष्य की ओर बढते हुए कई लगों के लिये प्रेरणास्रोत है। 

मित्रों, ऐसा नही है कि रजनी और रश्मि को कभी नकारात्मक खयाल नही आए किन्तु उन दोनों ने अपने आत्मनिर्भर बनने के सपने को ज्यादातर सकारात्मक खाद से ही सींचा। जिसका सुखद परिणाम आज उन दोनो के सामने है। ये मेरा सौभाग्य है कि हमें इनको पढाने का अवसर प्राप्त हुआ और जीवन में इनसे बहुत कुछ सीखने को भी मिला।  आज भले ही शिक्षा के सोपान को पार करके इन दोनों ने नौकरी के सोपान पर कदम रख लिया हो, परंतु उनकी राह आसान नही है। अभी भी वे समाज में अपने अस्तित्व को स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं। हमारे समाज का कर्तव्य बनता है कि हम उनके प्रयासों की प्रशंसा करें और उनको अपना सहयोग दें क्योकि नये वातावरण में सामजस्य बैठाने में थोङा वक्त लगता है। वैसे तो इस प्रकार की परेशानी किसी के साथ भी हो सकती है किन्तु नई जगह पर वाँश रूम जाने या सीट पर वापस आने जैसी छोटी-छोटी मुश्किलों में महिला सहकर्मचारियों का सहयोग इनके लिये सकारात्मक सहारा बन सकता है। समाज का ईमानदारी से किया सहयोग रजनी और रश्मि जैसे अनेक लोगों को आगे बढने के लिये हौसला दे सकता है।  अतः अपना सहयोग दें न की दया, क्योंकि आपका सहयोग सभ्य समाज का संदेश भी देगा।

नोटः-  सभी पाठकों से निवेदन है कि, YouTube पर रजनी की आवाज में उसके मन की बात आप अवश्य सुने। आपके सकारात्मक संदेश भी रजनी एवं रश्मि को हौसला देंगे अतः अपने विचार अवश्य लिखें, हम आपका संदेश उन तक अवश्य पहुँचायेंगे। 
धन्यवाद
YouTube Link :-  
A request






  

Sunday, 26 October 2014

दुविधा रूपी अंधकार को आत्मविश्वास से आलोकित करें


अक्सर कई छात्र मेल के द्वारा या फोन के माध्यम से हमसे पूछते हैं कि हम प्रवेश परिक्षाओं में कैसे सफलता पायें या किस तरह तैयारी करें कि हमें कामयाबी मिले?  सच तो ये है कि, कामयाबी की चाह लिये हम सब अपने-अपने क्षेत्र में सफल होना चाहते हैं। परन्तु अपने कार्य सम्पादन के दौरान अक्सर एक दुविधा में भी रहते हैं कि हमारे द्वारा किया गया कार्य सफल होगा या नही, ये हम कर पायेंगे या नही  इत्यादि इत्यादि. मित्रों, इस तरह की आशंकायें हमारी ऊर्जा को छींण करने का प्रयास करती हैं और स्वंय के विश्वास पर एक प्रश्न चिन्ह लगा देती हैं।  यही दुविधा सफलता की सबसे बङी बाधा है। किसी भी कार्य को करने से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार करना कार्य की रणनीति होती है परंतु जब नकारात्मक पहलु योजना पर हावी होता है तो यही संशय सफलता की सबसे बङी अङचन होती है। जिसके कारण हम एक कदम भी आगे नही रख पाते। जबकि जीवन का सबसे बङा सच है कि हमेशा परिस्थिति एक जैसी नही रहती, लक्ष्य की सफलता में कई रोङे आते हैं। जो इन रुकावटों को आत्मविश्वास के साथ पार करता है वो लक्ष्य हासिल करने में सफल होता है। लेकिन दूसरी ओर जो दुविधा के जंजाल में फंस जाता है, वो कभी भी आशाजनक सफलता नही अर्जित कर पाता है। ज्यादातर लोग ज्ञान और प्रतिभा की कमी से नही हारते बल्की इसलिये हार जाते हैं कि दुविधा में पङकर जीत से पहले ही मैदान छोङ देते हैं।

दुविधा तो एक द्वंद की स्थिति है, जिसमें व्यक्ति निर्णय नही ले पाता और न ही स्वतंत्र ढंग से सोच पाता है। इतिहास गवाह है कि प्रत्येक सफल व्यक्तियों के रास्ते में अनेक मुश्किलें आईं किन्तु उन्होने उसे एक स्वाभाविक प्रक्रिया समझा और आगे के कार्य हेतु कोशिश करते रहे। कई बार हम लोग किसी कार्य को करने से पहले इतना ज्यादा सोचते हैं कि समय पर काम नही हो पाता या हम अवसर को दुविधा के भंवर में कहीं खो देते हैं। यदि हम विद्यार्थी की बात करें तो कई बार ऐसा होता है कि कुछ छात्र विषय को लेकर इतने ज्यादा संशय में रहते हैं कि वो फार्म भरने में लेट हो जाते हैं या आशंकाओं के चक्कर में गलत विषय का चयन कर लेते हैं। जबकि सच तो ये है कि सभी विषय में मेहनत करनी होती है तभी अच्छे अंक मिलते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि एक बुद्धिमान व्यक्ति भी लंबे समय तक दुविधाग्रस्त रहता है तो उसका भी मानसिक क्षरण हो जाता है। जिसके कारण सक्षम व्यक्ति भी उन्नति नही कर पाता। दुविधा सफलता की राह में सबसे बङी अङचन है। अत्यधिक संशय आत्मविश्वास को भी कमजोर बना देता है। यदि हम एक परशेंट असफल भी होते हैं, तो भी हमारे अनुभव में इजाफा ही होता है और अनुभव से आत्मविश्वास बढता है। मन में ये विश्वास रखना भी जरूरी है कि सब कुछ संभव है।

स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि,  संभव की सीमा जानने का सबसे अच्छा तरीका है, असंभव से भी आगे निकल जाना।

जो लोग सफलता की इबारत लिखे हैं उन्हे भी दुविधाओं के कोहरे से गुजरना पढा है परन्तु ऐसे में उन लोगों ने परिस्थिति को इस तरह ढाला कि वे अपनी योजनाएं  स्वयं निर्धारित कर सके। सफलता के लिये ये भी आवश्यक है कि हम हर परिस्थिति में स्वंय को तैयार रखें। किसी भी सफलता के लिये ये जरूरी है कि हम निर्णय लेने की भूमिका में आगे बढें; क्योंकि एक कदम भी आगे बढाने के लिये निर्णय तो लेना ही पङता है, तद्पश्चात जिंदगी हमें धीरे-धीरे खुद ही निर्णय लेना सीखा देती है। अतः सबसे पहले हम दुविधापूर्ण मनः स्थिति के शिकार न होते हुए स्वंय को संतुलित रखते हुए दुविधा रूपी अंधकार को आत्मविश्वास से आलोकित करें, जिससे आशंकाओं और दुविधाओं का तिमिर नष्ट हो तथा सफलता की और हमसब का कदम अग्रसर हो।

डॉ.ए.पी.जे. कलाम के अनुसार,  Confidence & hard work is the best medicine to kill the disease called failure. It will make you a successful person. 

Best of Luck 

Wednesday, 22 October 2014

दिपावली की शुभकामनाएं


                   सभी पाठकों को दिपावली की हार्दिक बधाई
               
                 दिपावली का ये पावन त्योहार,
                 जीवन में लाये खुशियाँ अपार,
                लक्ष्मी जी विराजें आपके द्वार,
 मंगल कामनाओं से आलोकित हो आपका घर संसार।
                              शुभ दिपावली


Monday, 20 October 2014

मानवीय चेतना को प्रकाशित करें


आज जीवन, समाज एवं राष्ट्र के बहुत सारे अंग अँधेरे में घिरे हुए हैं। आज की दुनिया में सेवा, सहकार, त्याग आदि गुणं को अलगाववाद, आतंकवाद एवं जातिवाद तथा स्वहित के सघन अंधेरे ने घेर लिया है।  हिंसा, अपराध, हत्या,  भ्रष्टाचार एवं बलात्कार जैसी घटनाएं हर किसी को भयभीत कर रही हैं। मित्रों,  सच तो ये है कि अँधेरे की कोई सत्ता नही होती वह तो केवल प्रकाश का अभाव मात्र है, जैसे ही प्रकाश का आगमन होता है वह अंधेरा अपने आप दूर चला जाता है।  जब आत्मबल, मनोबल एवं साहस रूपी तेल का दिया संकल्प तथा पराक्रम की बाती के साथ जलता  है तो आशा विश्वास एवं उत्साह का वातावरण निर्मित होता है जिससे सभी अंधकार, अर्धम तथा नकारात्मक ऊर्जाओं का अंत निश्चित है। दिपावली में जलने वाले अनगिनत दीप भले ही छोटे-छोटे  हैं परंतु इन छोटे दिपों में मानवीय चेतना समाई हुई है।  इन्ही दिपों में  जिंदगी का बुनियादी सच समाया हुआ है। अप्प दिपो भव कहकर भगवान बुद्ध ने दिये के महत्व को अभिव्यक्त किया था।  ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि एक छोटा सा दिया जिस तरह अंधेरे को दूर करता है उससे  अनेक लोगों को आगे बढने की प्रेरणा मिलती है। अतः मित्रों इस दिपावली पर दिये की शक्ती को आत्मसात करते हुए ऐसा दिपक जलाएं जिसमें आशा और विश्वास का समावेश हो, उसकी ज्योति से अंर्तमन के साहस को प्रकाशित करें जिससे जीवन के सभी रास्ते भयमुक्त हों और सफलता रौशन हो।  एकता तथा वसुधैव कुटुंबकम की भावना लिये  इस दिपावली हमसब मिलकर आतंक के इन अंधकार रूपी असुरों का नाश करें। जिससे सम्पूर्ण विश्व मुस्करा सके और प्रकाश पर्व सार्थक हो।   

रौशनी का पर्व है, दिप सबको मिलकर जलाना है,
जो हर दिल को अच्छा लगे गीत ऐसा सुनाना है,
गिले-शिकवे सब भूलकर सबको गले लगाना है,
ईद हो या दिपावली बस खुशियों का पर्व मनाना है। 

दिपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

मित्रों पूर्व की पोस्ट पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें।

http://www.roshansavera.blogspot.in/2012/11/happy-deepawali_11.html



Sunday, 5 October 2014

किताबों का सुनहरा संसार

आज की अत्याधुनिक जीवन शैली में अनेक लोग लेपटॉप, मोबाइल आई पैड लिये कहीं भी दिख जायेंगे। बस का सफर हो या ट्रेन का कहीं भी अप टू डेट कहे जाने वाले लोग इंटरनेट के माध्यम से गुगल पर सर्च करके सभी जानकारी से अपडेट हो जाना चाहते हैं। मित्रों, क्या आपने कभी ये सोचा कि ये हाई प्रोफाइल माध्यम में जानकारियां आईं कहाँ से ? निः संदेह इन जानकारियों का स्रोत हमारी किताबें ही जहाँ से इन जानकारियों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में परिवर्तित करने का प्रयास चल रहा है। परंतु अभी भी ज्ञान का अथाह सागर लिये हमारी पुस्तकों का ज्ञान इन आधुनिक उपक्रमों में मिल पान असंभव है। जिन्हे  वास्तविकता में जानकारियों की चाहत होती है उन्हे  तो किताबों के संसार में ही डुबकी लगाने से तृप्ति मिलती है। सच्चाई तो ये है कि गुगल जैसे सर्च इंजन हमारी जिज्ञासा को पूर्णतः शान्त नही कर सकते उसके लिये तो हमें किताबों के शरण में ही जाना चाहिये। 


पुस्तकें हमारे समाज का आइना होती हैं। जिनके जरिये हम अपने अतीत के गौरवमय इतिहास को देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं। प्रेमचंद जी की कहानियाँ हों या टैगोर की कविताएं सभी के माध्यम से सामजिक चित्रण हमारे मानस पटल को छू जाता है। गर्मी की छुट्टियों में नंदन, चंदामामा,चंपक और चाचा चौधरी जैसी अनेक किताबों को पढते हुए बच्चे, एक मधुर कल्पना में कहीं खो जाते थे। परंतु आज स्थिती बदल गई है, पुस्तकें तो बहुत हैं किन्तु आधुनिकता की चादर ओढे लोग उन्हे पढना नही चाहते। आज के बच्चे भी मोबाइल पे गेम खेलकर या टीवी देखकर अपना मनोरंजन कर रहे हैं। जबकि पुस्तकें तो हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं, सिर्फ देना जानती हैं बदले में आपसे कुछ नही माँगती। पुस्तकें तो हमें एक ही जगह बैठे-बैठे दुनिया की सैर करा देती हैं। हमारे व्यक्तित्व को निखारती हैं। हावर्ड विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक डेनियल गोलमैन के अनुसार, किताबों से हमें अलग-अलग प्रकार के लोगों को समझने में मदद मिलती है। किस्से कहानियों के माध्यम से हमें एक नया अनुभव और नजरिया मिलता है।हम दूसरे लोगों की सोच और व्यवहार का अंदाजा लगा सकते हैं।

एक सर्वे के अनुसार यदि रोजमर्रा की भाग-दौङ भरी जिंदगी में से मात्र 6 मिनट आप कुछ पढने के लिये निकाल लें तो सच मानिये आपके स्ट्रेस का 2/3 हिस्सा यूँ ही कम हो जाता है। युनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स में माइंड इंटरनेशनल द्वारा किये शोध के अनुसार, संगीत सुनने, वॉक पर जाने या चाय पीने के मुकाबले कुछ पढने से स्ट्रेस तेजी से कम होता है।शोधकर्ताओं का मानना है कि पढते हुए व्यक्ति को अपना दिमाग एक जगह केन्द्रित करना होता है और ऐसा करने से उसके मन एवं शरीर का टेंशन धिरे-धिरे निकल जाता है। शोध के नतीजे बताते हैं कि, संगीत से 61 फीसदी, चाय से 54 फीसदी एवं वॉक से 42 फीसदी तनाव घटता है। जबकी पढने से 68 फीसदी तनाव घटता है। मित्रों, आज हमलोगों की जीवन शैली अनेकों तनावों के अधीन हैं और तो और अर्थव्यवस्था पर कम्प्युटर का  प्रतिदिन बढता प्रभाव तनाव को और बढा रहा हैं। ऐसे में किताबों को पढने की आदत हमारे तनाव को कम करने में बहुत मददगार साबित होतीं हैं।

22वें विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि, देश में ज्ञान की भूख अधिक है और इंनटरनेट के युग में भी किताबों की अहमियत बरकरार है क्योंकि किताबें पढने की आदत हमारी सभ्यता में निहीत है। उन्होने कहा कि कोई भी सभ्य समाज बच्चों के लिये सार्थक लेखन के बिना विकसित नहीं हो सकता। भारत देश में तो ज्ञान और पुस्तकों की परंपरा का आदर किया जाता है।

प्राचीन समय में ताम्रपत्र पर लिखे साक्ष्य और प्राचीन ग्रंथो को प्रमाणिक माना जाता है। इनमें लिखी बातों को बिना किसी विवाद के स्वीकार किया जाता है और यही कारण है कि व्यक्ति इनमें निहीत ज्ञान को अपने जीवन में अपनाता है। रामयण, गीता, कुरान, बाइबिल और गुरुग्रन्थ साहिब जैसी पुस्तकें सिर्फ पढी ही नही जाती बल्की उनके अनुयायी उनकी पूजा भी करते हैं। पुराने समय में जब लङकियों को पढाया नही जाता था तब भी उन्हे धार्मिक पुस्तकों को पढने के लिये अक्षर ज्ञान दिया जाता था।

आज हमारे देश में अनेक न्यूज चैनल हैं फिर भी सुबह-सुबह अखबार का इंतजार इस बात को सत्यापित करता है कि प्रिंट मिडीया का महत्व अभी भी हमारी जिंदगी में है। अतः मित्रों, हम आज के परिवेश में किताबों के महत्व को अनदेखा नही कर सकते। आज भी हमारी संस्कृति, सभ्यता, धर्म तथा आध्यात्म को समेटे हमारी पुस्तकें ज्ञान का भण्डार हैं। जिसके अस्तित्व को नकारा नही जा सकता।
A room without Books is like a Body without a Soul.  


नोटः- आपके विचार (Feed Back) लेख को मजबूत बनाते हैं और लिखने की क्रिया को प्रेरणा प्रदान करते हैं। अतः मित्रों, लेख के प्रति अपने विचारों को हमसे (सांझा) शेयर करें। धन्यवाद

Thursday, 2 October 2014

दशहरा की हर्दिक बधाई




सुखद और संपन्न जीवन  की शुभकामना के साथ विजयदशमी की हार्दिक बधाई  

नोटः- दशहरा से संबन्धित लेख को पढने के लिये दिये हुए लिंक पर क्लिक करें,  अपने विचार (Feed Back) अवश्य लिखें। आपके विचार लेख को सुदृण बनाते हैं। धन्यवाद  

असत्य पर सत्य की जीत

Wednesday, 1 October 2014

राजनीति के रत्न, लाल बहादुर शास्त्री


राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी का अभिनंदन करते हुए, 2 अक्टुबर को जन्में गाँधीवादी विचारधारा से ओतप्रोत लाल बहादुर शास्त्री जी का भी वंदन करते हैं। लाल बहादुर शास्त्री जी अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को दर किनार करते हुए काम की चिन्ता करते थे, न की नाम की। जातिवाद का विरोध करते हुए उन्होने अपने नाम के आगे से श्रिवास्तव सरनेम हटा दिया था। विद्यापीठ से मिली शास्त्री की उपाधी से ही वे जनमानस में लोकप्रिय रहे। भारत की आजादी के उपरान्त काम के प्रति उनकी निष्ठा, परिश्रम तथा विश्वास को देखते हुए उन्हे उत्तर प्रदेश मंत्रीमंडल में संसदिय सचिव बनाया गया। उत्तर प्रदेश सरकार में जब वह गृहमंत्री थे तब उन्हे कांग्रेस का महामंत्री बनाया गया। केंद्रिय मंत्रीमंडल में रेलमंत्री के रूप में उन्होने बहुत अच्छा काम किया था। किंतु दो रेल दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिये। उनके समर्थन में हजारों तार एव खत आये परंतु उन्होने दुबारा रेलमंत्री का पद ग्रहण नही किया। उनके अद्भुत व्यक्तित्व का ही परिणाम था कि, नेहरु जी के बाद श्री शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाया गया। प्रधान मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल अनेक चुनौतियों से युक्त था। फिर भी वे तनिक भी विचलित हुए देशहित के लिये अनेक निर्णय लिये, जिसमें 1965 की सुबह पाकिस्तान का भारत पर अचानक आक्रमण, अत्यधिक चुनौतिपूर्ण था। इस कार्य को शास्त्री जी ने बहुत ही सजगता पूर्ण किया। उन्होने देश को एक सफल नेतृत्व प्रदान किया। शास्त्री जी ने जय जवान जय किसान का नारा देकर राष्ट्र के दो आधार स्तंभो, सैनिकों और किसानों का मनोबल बढाया। 

शास्त्री जी का जिवन कर्ममय रहा। कभी-कभी तो काम में इतने लीन हो जाते थे कि भोजन करना ही भूल जाते थे। कर्मक्षेत्र में उनकी तद्परता और सहजता सदैव परिलाक्षित होती है। वे अपने कर्मचारियों में कर्म के प्रति आलस के भाव को बिलकुल भी पसंद नही करते थे। असंभव समझा जाने वाला कार्य जब शास्त्री जी को दिया जाता था तो वो उसे इतनी सरलता से पूर्ण कर देते थे कि विरोधी भी उनकी प्रशंसा किये बिना नही रह पाते थे। शास्त्री जी का एक-एक पल देशहित के कामों में समर्पित था। शास्त्री जी की लोकप्रियता का आलम ये था कि, उनके प्रारंभिक जीवन से ही अनेक लोग उन्हे पसंद करते थे। राजनीति के छलप्रपंच रूपी किचङ में वो कमल के समान थे। उनकी ईमानदारी एवं कतर्व्यनिष्ठा की आज भी मिसाल दी जाती है। राष्ट्र के पैसे को वो कभी भी स्वहित के लिये खर्च नही करते थे। भारत रत्न से अलंकृत लाल बहादुर शास्त्री जी राजनीति के भी अनमोल रत्न हैं। सादा जीवन और उच्च विचार की ज्योत जलाने वाले अनमोल रत्नो को उनके जन्म दिवस पर शत्-शत् नमन करते हैं। 
जय भारत 

नोटः- निवेदन है कि, दिये हुए लिकं पर क्लिक कर उन्हे भी पढे तथा अपने विचार (Feed back) अवश्य दें. आपके विचार लेख को सशक्त बनाते हैं। धन्यवाद :)
लोक हितकारी सितारे




Thursday, 25 September 2014

शक्ति और प्रकृती


हम लोग वर्ष में दो बार नवरात्री का पर्व पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव से मनाते हैं, जिसमें देवी की आराधना की जाती है। श्री दुर्गा सप्तशती में भगवती की आराधना करते हुए कहा गया है कि, 

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणता स्म ताम्।। अर्थात, प्रकृति को देवी का प्रतिकात्मक रूप मानकर उनकी वंदाना की गई है। वहीं एक और श्लोक में कहा गया है कि,  

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। या देवी  सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। अर्थात, माँ सभी प्राणियों में शक्ति रूप में विद्यमान हैं और जो देवी सभी प्राणियों यानि की नारी में माँ बनकर विद्यमान हैं वो आदि शक्ति हैं। इस तरह नारी और प्रकृति दोनो ही जीवन में आस्था का आधार हैं और दोनो ही जगतमाता का रूप हैं। 

मानव सभ्यता के कितने वर्ष बीत गये इसका अंदाजा लगाना कठिन है। परंतु आज की आधुनिक सभ्यता वाली इक्कीसवीं शताब्दी के 14वर्ष  बीत जाने के बाद भी नारी और प्रकृति दोनो ही शोषण के आघात से व्याकुल हैं। राम का वनवास तो चौदह वर्ष बाद पुरा हो गया किन्तु नारी और प्रकृति को कब तक उपेक्षित होना है इसका कोई आधार आज भी नज़र नही आ रहा है।

आज की शहरीकरण की सभ्यता ने हरे-भरे जंगल को विरान कर दिया है। मानव अपने स्वार्थ में प्राकृतिक संसाधनो का दोहन अंधाधुन कर रहा है, नित नई ओद्योगिक कारखानो की उष्मा से हिमखण्ड पिघल रहे हैं।आज मानव द्वारा प्रकृति से की गई छेडछाड का ही नतीजा है धरती के स्वर्ग कश्मीर में बांण का प्रकोप तथा पिछले वर्ष केदार नाथ की तबाही। आज मानव को विधात बनता देख अमरनाथ भी पृथ्वी पर अवतरित होने से डरते हैं। अपने को सर्वशक्तिमान समझता मानव हरी-भरी वसुंधरा का संहार करके अपने ही पैर पर कुल्हाङी मार रहा है, आधुनिकता के रंग का चश्मा पहने हमारी मानव सभ्यता को भविष्य का अंधकार नजर नही आ रहा है। प्रसिद्ध दार्शनिक मैजिनी ने अपने युग में कहा था कि, यदि मानव सभ्यता व संस्कृति को अपना अस्तित्व बरकरार रखना है तो उसे नारी की श्रेष्ठता सुनिश्चित करनी होगी। उसने अपने निश्कर्ष में ये भी कहा था कि नारी एवं प्रकृति के बिना जीवन संभव नही है।

हमारे शास्त्रों और वेदों में नारी और प्रकृति को शक्ति का स्वरूप माना है।
आज हम लोग बेटी बचाओ और पर्यावरण की सुरक्षा के लिये अनेक माध्यमों से प्रयास कर रहे हैं, परंतु ये भागीरथ प्रयास पूरी तरह से सफल नही हो पा रहा है क्योंकि  विडंबना ये है कि, 365 दिन में से केवल 18 दिन ही यानि की शारदिय नवरात्र के नौ दिन एवं क्वार नवरात्र के नौ दिन ही हम लोग प्रकृति और नारी के बाल रूप कन्या को कुछ विशेष पूजते हैं। वर्ष के अधिकांश दिनों में तो हम आस्था, सम्मान और सुरक्षा को महज शब्द मात्र ही समझते हैं।

पाश्चात्य सभ्यताओं की बात करें तो,  प्राचीन रोमन साम्राज्य में महिलाओं और प्रकृति को उपभोग का साधन माना जाता था। फ्रांस में स्त्री को आधी आत्मा वाला जीव एवं प्रकृति को जङ मानने का चलन था। प्राचीन चीनवासी महिलाओं में शैतान की आत्मा देखा करते थे, प्रकृति तो बस उनके लिये एक संसाधन थी। इस्लाम के प्रचार से पहले अरबवासी लङकियों को जिंदा दफन कर देते थे।  हमारे भारत में ऐसी अमानविय विचारधारा का इतिहास नजर नही आता फिर भी आज आधुनिकता की चादर ओढे भारत में जमीनी हकिकत यही है कि, नारी एवं उसका अस्तित्व  कुछ  तामसी प्रवृतियों के आतंक से आतंकित है। मानव यदि सुसभ्य होने व सुसंस्कारित होने का दावा करता है तो उसी के बनाये हुए सभ्यता व संस्कृति के मानकों में नारी एवं प्रकृति के शोषण का कोई स्थान नही होना चाहिए। 

शरशैया पर लेटे भीष्म ने धर्मराज युधिष्ठर को सुशासन की शिक्षा देते हुए उपदेश दिया था कि, ' किसी समाज व शासन की सफलता इस तथ्य से समझी जानी चाहिये कि वहाँ नारी एवं प्रकृति कितनी पोषित हैं। उन्हे वहाँ कितना सम्मान मिला है।' 

मित्रों, ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि आज जब हम मंगल की यात्रा को सफल बना सकते हैं तो अपनी पृथ्वी को भी मंगलमय वातावरण प्रदान कर सकते। अतः इस नवरात्री के शुभ पर्व पर शक्ति और प्रकृति को जीवन पर्यन्त पोषित और सम्मानित करने का प्रण करें। जिससे भारत की गौरवमय संस्कृति पुनः गौरवान्वित हो जाये। 

जय माता दी

नोट: दिये गये लिंक पर क्लिक करके उन्हे भी पढें तथा अपने विचार अवश्य व्यक्त करें. 
माँ दुर्गा का अनुपम पर्व

जीवन की आपा-धापी में क्या खोया क्या पाया



Wednesday, 24 September 2014

मंगल ग्रह की सफलता पर को़टी-कोटी बधाई



आज भारत के लिये स्वर्णिम दिन है, आज मंगल का मिलन मॉम से हुआ। ये एतिहासिक पल हम सब भारतवासियों के लिये गर्व करने योग्य है। भारत का विज्ञान तो पुरातनकाल से विश्व में अपना एक विशेष स्थान रखता है। आज की सफलता ने वैज्ञानिकों की कामयाबी का एक अध्याय और लिख दिया। भारत के वैज्ञानिक और इस अभियान से जुङे सभी लोगों को कोटी-कोटी बधाई। 


आइये जानते हैं कि मंगल ग्रह के बारे में,

मंगलग्रह का नाम ग्रीक शब्द आर्क से लिया गया है जिसका मतलब है, God of War यानि की युद्ध का देवता। इसका लाल रंग इसकी विशेषता है जिसकी वजह से इसका नाम युद्ध के देवता के नाम पर रखा गया। इस ग्रह पर पाई जाने वाली मिट्टी में जंग लगे हुए लौह मिले होने के कारण पुरी तरह लाल दिखती है। आकार में ये सातवाँ बङा ग्रह है और वजन में पृथ्वी के वजन का दसवां हिस्सा है। इसका तापमान -207 डिग्री से  + 81 डिग्री तक जाता है। अर्थात यहाँ खूब ठंडक पङती है या खूब गर्मी पङती है। सूर्य के चारो ओर ये 687 दिन में ये एक चक्कर पूरा करता है। इसपर पृथ्वी के गुरुत्व बल का एक तिहाई गुरुत्व बल मौजूद है। इसके दो चंद्रमा हौं जिनके नाम फोगोस और डेमोस हैं। डेमोस से फोबोस थोङा बङा है जो सतह है 6000 किमी ऊपर परिक्रमा करता है। फोबोस धिरे-धिरे मंगल की ओर झुक रहा है जो 100वर्ष में मंगल की ओर 1.8 मी. झुक जाता है। मंगल का एक दिन 24घंटे से थोङा ज्यादा होता है। मंगल और धरती लगभग दो साल में एक दूसरे के सबसे करीब होते हैं। उस दौरान दोनो के बीच की दूरी 5करोङ 60लाख किमी होती है। मंगल ग्रह सौर्य मंडल का चौथा ग्रह है। पृथ्वी से इसकी आभा रक्तिम दिखती है। जिस वजह से इसे लाल ग्रह कहते हैं। पृथवी की तरह मंगल भी एक स्थलिय धरातल वाला ग्रह है। सौर मंडल का सबसे ऊँचा पर्वत ओलम्पस मोन्स मंगल पर स्थित है, साथ ही विशालतम कैन्यन वैलेस मैरी नेरिस भी यहीं स्थित है। 

28 नवम्बर को हर साल रेड प्लेनेट डे यानि मंगल ग्रह के नाम का एक दिन मनाते हैं। 28 नवम्बर 1964 को स्पेस क्राफ्ट मेरीनर 4 को लॉच किया गया था जो अपने 228 दिन के मिशन में पहली बार हमारे लिये इस लाल रंग के खूबसूरत ग्रह मंगल की तस्वीर लेकर आया था। ये मंगल की पहली और सफल यात्रा थी। अतः इसकी याद में इस दिन को रेड प्लेनेट डे के नाम से जाना जाने लगा। मान्यतानुसार ये कहा जाता है कि धरती पर जीवन सम्बन्धी तत्व मंगल से ही आया है।

मार्स ऑरबीटर की सफलता पूर्वक यात्रा का संक्षिप्त परिचय

भारत के मंगल यान को 5 नवम्बर 2013 को ध्रुविय रॉकेट के माध्यम से दोपहर ढाई बजे आन्ध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया था। जिसके बाद मंगल यान विधी पूर्वक पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश कर गया। भाारतीय अनुसंधान संघटन के अध्यक्ष के राधा कृष्नन ने प्रक्षेपण के बाद कहा कि, "पी एस एल वी का ये 25वाँ प्रक्षेपण है और ये नये तथा जटिल अभियान प्रारूप के तहत किया गया है।" 

लगभग 1340 किलो ग्राम वजनी यान का निर्माण पूर्णतः स्वदेशी तकनिक से किया गया है। उपग्रह में ऐसी प्रणालियां है जिसमें यान खुद निर्देशित होगा और अपनी गलतियाँ स्वयं सुधारेगा। इसमें नेविगेशन प्रणाली है यानि की मार्ग भटकने पर वो स्वंय रास्ता तलाश लेगा क्योंकि रॉकेट से अलग होने के बाद मंगल यान को लम्बा सफर तय करना था। मार्स ऑरबिटर मिशन अंतरिक्ष यान को 8 नवम्बर 2013 को दुरस्त बिन्दु पृथ्वी से सबसे दूर का बिन्दु 28 हजार 6 सौ 14 किमी से 40 हजार एक सौ 86 किमी पर उठा दिया गया। भारतिय अंतरिक्ष अनुसंधान संघटन इसरो ने 9 नम्बर 2013 मार्स ऑरबिटर यान को कक्षा से बाहर निकालने की तीसरी प्रक्रिया भी पूरी कर ली, 707 सेकेंड के वन टाइम के साथ अंतरिक्ष यान को दूरस्थ बिन्दु यनि धरती से सबसे ज्यादा दूरी का बिन्दु 40 हजार 186 किमी से उठाकर 71 हजार 636 किमी पर स्थापित कर दिया गया।  मार्स ऑरबिटर यान के अभियान में 11 नवम्बर 2013 को चौथी प्रक्रिया में थोङी बाधा उत्पन्न हुई परन्तु 12 नवम्बर को सफलता पूर्वक चौथी प्रक्रिया भी पूरी कर ली गई। चौथी प्रक्रिया ने यान को 124.9 मीटर प्रति सेकेन्ड की गति प्रदान की। लगभग एक महिने तक पृथ्वी के इसफियर ऑफ इन्फ्लूयेन्श यानि की SOI में चक्कर लगाने के बाद मार्स ऑरबीटर मंगल ग्रह की लंबी यात्रा पर करोङों लोगों की शुभकामना के साथ एक दिस्मबर 2013 को रवाना हो गया। इस प्रकार, इसरो के वैज्ञानिकों ने मंगल यान को लाल ग्रह की तरफ भेजने का पहला चरण सफलता पूर्वक पूरा कर लिया । 

ऑरबीटर को पृथ्वी की कक्षा से निकालकर मंगल के पथ पर डालने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल होती है। पूरी तरह गणित पर आधारित इस काम में जरा सी भी चूक किये कराये पर पानी फेर सकती थी। पृथ्वी के प्रभाव से मुक्त करने के लिये इसमें लगी 440 न्यूटन लिक्विड ए पो जी मोटर को फायर किया गया जो सफल रहा। इस प्रक्रिया को ट्रांस मार्स इंजेक्शन यानि की TMI का नाम दिया गया। ये प्रक्रिया इस लिये भी जटिल है क्योंकि खास पथ बिंदु पर से इस को यान पृथ्वी की कक्षा से मंगल की राह पर धक्का दिया गया। यान को 648 मी. प्रति सेकेंड का गतिशील वेग प्रदान करने के लिये 440 न्यूटन तरंग इंजन को 23 मिनट तक चलाया गया। इसमें 190 किग्रा. ईधन की खपत हुई। यान को मार्स ट्रांसफार्मर प्रेजेकटरी में उतने ही वेग से भेजा गया जितना उसे पृथ्वी के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकालने के लिये जरूरी था। यान ने अपनी यात्रा सही दिशा में शुरु कर दी। भारत ने इस अभियान में लगभग 450 करोङ रूपये खर्च किये हैं जो बाकी देशों की अपेक्षा सबसे किफायती रहा है। 

इसरो के मंगल यान ने अपने कैमरे में पहली तस्वीर कैद की जिसमें आन्ध्र प्रदेश की तरफ बढ रहे भीषण चक्रवाती तुफान हेलेन की फोटो थी। 19 नवम्बर 2013 को खींची गई ये तस्वीर 21 नवम्बर 2013 को जारी की गई। मार्स ऑरबीटर अंतरिक्ष यान पर लगे मार्स कलर कैमरे से 67 हजार 975 किमी की ऊँचाई से ली गई फोटो है। मंगल यान में पाँच यंत्र लगे हुए हैं, 

1- मिथेन सेंसर जो की लाल रंग के वातावरण की गैसों का विशलेषण करेगा।
 2- कम्पोजीशन एण्ड लाइजर, इसका कार्य है वातावरण का अध्यन करना।
 3- फोयो मीटर, ये ग्रह के ऊपरी वातावरण में हाइड्रोजन आदि की मात्रा के बारे में शोध करेगा।
 4- कलर फोटो कैमरा, ये ग्रह के धरातल की फोटो लेगा तथा मंगल पर स्थित उपग्रहो फोबस और डेमोस के चित्र भी लेगा।
 5- इमेजिंग स्पेक्टो मीटर, ये लाल ग्रह की सतह पर मौजूद तत्वों और खनिजों के आँकङे जमा करेगा। 

मंगल अभियान के महानायक हैं, के राधा कृष्नन जो की इसरो के प्रमुख हैं। कर्नाटक संगीत और कथककली में पारंगत राधा कृष्नन भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक एवं तकनिकी संस्थान के तत्कालीन बोर्ड के चेयरमैन भी हैं। इनके अलावा इस अभियान से जुङे अन्य महानायक हैं, विक्रम सारा भाई केन्द्र के निदेशक एस रामा कृष्नन आपके पास रॉकेट पोलर सेटेलाइट को छोङने की जिम्मेदारी थी।  एम. अन्ना दुराई मार्स ऑरबिटर कार्यक्रम के निदेशक रहे आपको बजट प्रबंधन तथा कार्यक्रम प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ए. एस. किरण कुमार, एम वाई एस प्रसाद, एस के शिव कुमार, पी कुही कृष्नन जैसे महानयकों के साथ लगभग एक लाख वैज्ञानिकों ने मंगल यान की सफलता में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

मिशन मंगल से अनेकों लाभ हैं, मंगल पर मिथेन, हाइड्रोजन तथा अन्य खनिजों की संभावना है यदि भविष्य में मंगल पर ये खनीज मिलते हैं तो रूस अमेरीका यूरोप के साथ भारत भी इसपर अपनी दावेदारी स्थापित कर सकता है। इस यान की सफलता से अंतरिक्ष में छुपी जानकारियों का मार्ग प्रशस्त हुआ है और युवा वैज्ञानिकों के मन में नई खोज के प्रति जोश उत्पन्न हुआ है। यदि कभी मंगल पर बस्ती बसाने की योजना हुई तो भारत भी वहाँ अपनी कॉलोनी बना सकता है। मंगल की अपनी सफल यात्रा से  भारत की इसरो अंतरिक्ष एजेंसी भी अमेरीका की नासा, रूस की रॉसकॉसमस की श्रेणी में  शामिल हो गई है। इसी के साथ भारत दुनिया में पहला ऐसा देश बन गया जिसने अपने पहले ही प्रयास में मंगल अभियान को पूरा कर लिया। 

मंगल का सफलता पूर्वक सफर आगे भी मंगलमय हो तथा हमारा देश ऐसे ही आगे भी सफलता की इबारत लिखे यही शुभकामना करते हैं। 


  

Friday, 12 September 2014

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है, हिन्दी

वसुधैव कुटुम्बकम की भावना की अलख जलाती हमारी हिन्दी भाषा, दक्षिण से उत्तर तक तथा पश्चिम से पूरब तक  राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।  परंतु भारत की आजादी के 68 वर्ष बाद भी हिन्दी भाषा को लेकर कई राज्यों में विवाद चल रहा है जबकि संविधान के अनुसार 14 सितंबर 1949 को अनुछेद 343 एक  के अनुसार  हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया तथा ये 26 जनवरी 1950  से अधिकारिक तौर पर बोली जाने वाली भाषा बन गई।  संवेधानिक दर्जा प्राप्त हिन्दी को अभी भी  यदा-कदा अग्नि परिक्षा से गुजरना पङता है। विश्व स्तर पर अग्रसर हिन्दी अपने ही देश में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है।

संत कनफ्यूशियस के अनुसार, "अपनी भाषा हीन होने से कोई देश आजाद नही रह सकता।" 

संविधान के अनुसार हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है और हम 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की दासता से आजाद भी हो गये। अंग्रेज भारत छोङकर चले भी गये किन्तु उनकी अंग्रेजी के हम अभी भी गुलाम हैं। स्वतंत्रता के संघर्ष में जनमानस की भाषा, गाँधी, टैगोर, तिलक, दयानंद सरस्वति, एवं सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व वाले लोगों की भाषा हिन्दी को आज भी वो स्थान नही मिल सका जिसकी वो हकदार है। ये अजीब विडंबना  है कि आजादी के साठ दशक बाद भी स्वंय सिद्धा हिन्दी पूर्णतः सरकारी काम-काज की भाषा का सम्मान न पा सकी।

महात्मा गाँधी ने कहा था कि, "राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है।" 

इतिहास गवाह है कि, हमारे कई मुस्लिम शासकों ने हिन्दी को अपने कामकाज की भाषा माना था। मौहम्द गौरी ने अपने राजकीय काम-काज को देवनागिरी तथा हिन्दी में संपादित करने के आदेश दिये थे। उसने सिक्कों पर देवानागीरि में 'श्री हम्मी तथा मेहमूद साँब' अंकित करवाया था। शेरशाँह सूरी ने भी अपने शासन काल में सिक्कों पर देवनागिरी में 'श्री हम्पी तथा ऊँ' अंकित करवाया था। उनके शासन काल में परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से शासन का कार्य हिन्दी में किया जाता था। 18वीं शताब्दी में पेशवा, सिंधिया और होलकर जैसे मराठी राजघरानो में हिन्दी में ही कामकाज होता था। अनेक संतो जैसे नामदेव, चैतन्य महा प्रभु, गुरु नानक ने अपने उपदेश हिन्दी में दिये थे क्योकि हिन्दी जन-साधारण की भाषा थी। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, हिन्दी भाषा प्राचीन काल से सभी प्रान्तों को एक दूसरे से जोङे हुए है। आजादी का संदेश लिये हिन्दी भाषा ने सभी देशभक्तों को एक सूत्र में बाँधा था। 

दयानंद सरस्वती ने कहा था कि, "हिन्दी ही राष्ट्रीय एकता को शास्वत और अक्षुणं बना सकती है।"

एक सर्वे के अनुसार 24 प्रतिशत साक्षर लोगों में से केवल दो प्रतिशत ही लोग अंग्रेजी जानते हैं क्योंकि अंग्रेजी में नरेशन की दिक्कत है जबकि हिन्दी नरेशन की बला से मुक्त है। हमारी हिन्दी भाषा में बङों का सम्मान लिए 'आप' जैसे शब्द है, जबकि अंग्रेजी ने तो सभी को एक ही शब्द 'यू' (You)  के साँचे में कैद कर दिया है। समय के बंधनो से मुक्त हिन्दी भाषा में हमारी अभिवादन शैली, प्रणाम और नमस्कार नम्रता का प्रतीक है। हिन्दी समृद्ध और सर्वग्राही भाषा है। 

आचार्य केशवचन्द्र सेन के अनुसार, "भारत जैसे देश में जहाँ अनेक बोलियां बोली जाती हैं वहाँ हिन्दी ही सम्पर्क, सर्वसुलभ ओर सार्वभौमिक भाषा सिद्ध होती है। ये राष्ट्रीय एकता और अखंडता की प्रतीक है।" 

आजादी से पूर्व हम सब एक भाषा हिन्दी के साथ, एक उद्देश्य के लिए अंग्रेजों के खिलाफ थे, परंतु आज के परिवेश में कुछ राजनैतिक गतिविधियों ने भारत को अनेक राज्यों में बाँट दिया है, वहाँ की क्षेत्रिय भाषाएं अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगी हैं। आज जिसे देखो वो अपने को पहले पंजाबी, बंगाली, मराठी, कन्नण, मद्रासी आदि कहते हुए मिल जायेगा, बहुत कम ही लोग स्वंय को भारतवासी या हिन्दुस्तानी कहते हुए मिलते हैं। भाषाई विवाद का ही परिणाम है, अनेक राज्यों का स्वतंत्र उदय।मित्रों, भाषा पर कुठाराघात किसी भी राष्ट्र के लिए हितकर नही होता और राष्ट्र से बढकर किसी भी भाषा का कोई स्वाभीमान नहीं होता।  

भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ के लिए कहा जाता है कि चार कोस पर भाषा बदले छः कोस पर पानी, वहाँ सभी को एक सूत्र में बाँधना आसान नही है किन्तु सभी भाषाओं का मिश्रित रूप और संतो की वाणी से अलंकृत संवेधानिक भाषा हिन्दी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने में सक्षम है क्योंकि हिन्दी भाषा सद्भावना, प्रेम, श्रद्धा तथा अहिंसा, करुणा एवं विश्व मैत्री का प्रतीक है। 

वर्तमान में गूगल जैसे सर्चइंजन भी हिन्दी के विकास को समझते हुए अपनी कार्य प्रणाली को हिन्दी में भी उपलब्ध करा रहे हैं। हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने को भी अग्रसर है। अतः मित्रों विश्व स्तर पर अपना वर्चस्व रखने वाली हिन्दी भाषा को हम सब मिलकर वैश्विक मानचित्र पर नम्बर एक पर ले जाने का प्रयास करें और गर्व से हिन्दी भाषा को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनायें।