Wednesday, 23 April 2014

मानव एकता को इंसानियत के साथ जिवंत करें


मिलकर काम करने से बङी सी बङी चुनौतियाँ भी छोटी हो जाती हैं, इसी संदेश को जन-जन में पहुँचाने के लिए मानव एकता दिवस 24 अप्रैल को मनाया जाता है। यदि विचार करें तो आज की आधुनिक दुनिया में इस संदेश को प्रत्येक मानव को अपनाने की जरूरत है। मानवीय एकता को जिन्दा रखने के लिए मनुष्य में इंसानियत का गुण होना अति आवश्यक है। आज तो देश-दुनिया की बिगङती आवो-हवा, विकृत मानसिकता जनवरों से भी बदतर स्थिति को दर्शा रही है। जानवर भी संघटन की शक्ति को पहचानता है इसलिए समूह में रहता है परन्तु अति बुद्धीमान प्राणी इंसान स्वार्थी नेताओं के बहकावे में मानवीय एकता को कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर दिमक की तरह खोखला कर रहा है। 

दिल्ली में हुई अमानवीय घटना शायद ही कोई भूल पाया हो, असम में एक लङकी के साथ सरे आम कुछ लोग बदतमीजी कर रहे थे और लोग तमाशबीन खङे थे। बात लङकी या लङके की नही है बात है, अमानवियता की क्योंकि दरंदिगी का शिकार कोई भी कहीं भी हो सकता है। कुछ समय पूर्व एक अश्वेत छात्र को कुछ लोगों ने इतना पीटा की वो कोमा में चला गया। हाल ही में दिल्ली में एक असम के छात्र को इतना ज्यादा पीटा कि वो मर गया कोई बचाने नही आया जबकि तमाशबीन कई थे। इस तरह की वारदातें इस सच्चाई को साफ कर देती हैं कि केवल दो पाँव पर चलने वाला जीव जरूरी नही है कि मनुष्य हो क्योंकि मनुष्य तो संवेदनाओं और भावनाओं की प्रतिमूर्ती है। मानविय एकता को मजबूत करने के लिए सबसे पहले इंसानियत का पाठ आत्मसात करते हुए एक अच्छा इंसान बनना बहुत जरूरी है।

आज हम अत्याधुनिक तकनिक के जमाने में जी रहे हैं। मंगल पर घर बसाने की बात कर रहे हैं किन्तु ये बात भूल रहे हैं कि घर तो भाई-चारे से, प्यार मोहब्बत से तथा अमन चैन से बनता है।  हम मशीनी युग में जी रहे हैं, मनुष्य होने का दम भर रहे हैं परन्तु मनुष्यता से कोंसो दूर हो रहे हैं। पङौसी मुल्क के सैनिकों द्वारा धोखे से सीमा पर स्थित सैनिकों का सिर काटा जाना जबकि सैनिक तो विरता के प्रतीक होते हैं। ये बर्बरता क्या मनुष्यता को परिभाषित कर सकती है ?

आज दुनिया में महान बनने की चाहत तो हर एक में है पर पहले इंसान बनना भूल जाते हैं। एक वर्ष पूर्व केदारनाथ में आई प्राकृतिक त्रासदी से ज्यादा दुखित करने वाली इंसानी त्रासदी थी, जिसने इंसानियत को तार-तार कर दिया था। इंसानियत की सच्ची परिक्षा विषम परिस्थिती में ही होती है। सुख के समय तो हर कोई मानवता की दुहाई देता है। 

किसी ने सच कहा है कि, "इस जहाँ में कब किसी का दर्द अपनाते हैं लोग, हवा का रुख देखकर बदल जाते हैं लोग।"

ईश्वर ने मनुष्य को उसके स्वंय की शारीरिक बनावट एवं क्रियाओं से एकता का पाठ समझाया है। सभी अंगो के पारस्परिक सहयोग से ही मनुष्य क्रियाशील रहता है। प्राणी जीवन चक्र भी एक दूसरे के बिना संभव नही है, फिर भी हम मानवीय एकता को नजर अंदाज कर देते हैं। 


आज की भागम-भाग जिंदगी में कुछ इंसान ऐसे भी हैं जो इंसानियत को जिवंत करते हैं। मानवीय एकता के महत्व को प्राथमिकता देते हैं। कहते हैं "बूंद-बूंद से सागर भरता है।" इस उम्मीद के साथ भले ही मानवता दिवस महज एक दिन की ही बात क्यों न हो यदि उसे इंसानियत के साथ मनायेंगे तो हर-दिन, हर-पल मानवता का जय घोष होगा। हम सब का प्रयास यही रहे कि मानव एकता दिवस महज औपचारिकता न रहे क्योकि संघठन में ही शक्ति है।


"Where there is Unity, There is always Victory. "

Friday, 18 April 2014

रिश्तों का महत्व



शिशु  जन्म के साथ ही अनेक रिश्तों के बंधन में बंध जाता है और माँ-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी जैसे अनेक रिश्तों को जिवंत करता है। रिश्तों के ताने-बाने से ही परिवार का निर्माण होता है। कई परिवार मिलकर समाज बनाते हैं और अनेक समाज सुमधुर रिश्तों की परंपरा को आगे बढाते हुए देश का आगाज करते हैं। सभी रिश्तों का आधार संवेदना होता है, अर्थात सम और वेदना का यानि की सुख-दुख का मिलाजुला रूप जो प्रत्येक मानव को धूप - छाँव की भावनाओं से सराबोर कर देते हैं। रक्त सम्बंधी रिश्ते तो जन्म लेते ही मनुष्य के साथ स्वतः ही जुङ जाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते समय के साथ अपने अस्तित्व का एहसास कराते हैं। दोस्त हो या पङौसी, सहपाठी हो या सहर्कमी तो कहीं गुरू-शिष्य का रिश्ता। रिश्तों की सरिता में सभी भावनाओं और आपसी प्रेम की धारा में बहते हैं। अपनेपन की यही धारा इंसान के जीवन को सबल और यथार्त बनाती है, वरना अकेले इंसान का जीवित रहना भी संभव नही है। सुमधुर रिश्ते ही इंसानियत के रिश्ते का शंखनाद करते हैं।

इंसानी दुनिया में एक दूसरे के साथ जुङाव का एहसास ही रिश्ता है, बस उसका नाम अलग-अलग होता है। समय के साथ एक वृक्ष की तरह रिश्तों को भी संयम, सहिष्णुता तथा आत्मियता रूपी खाद पानी की आवश्यकता होती है। परन्तु आज की आधुनिक शैली में तेज रफ्तार से दौङती जिंदगी में बहुमुल्य रिश्ते कहीं पीछे छुटते जा रहे हैं। Be  PRACTICAL की वकालत करने वाले लोगों के लिए रिश्तों की परिभाषा ही बदल गई है। उनके लिए तो न बाप बङा न भैया सबसे बङा रूपया हो गया है।

किसी भी रिश्ते में धूप-छाँव का होना सहज प्रक्रिया है किन्तु कुछ रिश्ते तो बरसाती मेंढक की तरह होते हैं, वो तभी तक आपसे रिश्ता रखते हैं जबतक उनको आपसे काम है या आपके पास पैसा है।  उनकी डिक्शनरी में भावनाओं और संवेदनाओं जैसा कोई शब्द नही होता। ऐसे रिश्ते मतलब निकल जाने पर इसतरह गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सर से सिंग। परन्तु कुछ लोग अनजाने में ही इस तरह के रिश्तों से इस तरह जुङ जाते हैं कि उसके टूटने पर अवसाद में भी चले जाते हैं। कुछ लोग रिश्तों की अनबन को अपने मन में ऐसे बसा लेते हैं जैसे बहुमुल्य पदार्थ हो। मनोवैज्ञानिक मैथ्यु सेक्सटॉन कहते हैं किः-   इंसानी प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य, रिश्तों की खटास और पीढा को  अपने जेहन में रखता है और उसका पोषण करता है। जिसका मनुष्य के स्वास्थ पर बुरा असर पङता है। इस तरह की नकारात्मक यादें तनाव बढाती हैं। तनाव से शरीर में 'कार्टीसोल' नामक हार्मोन स्रावित होता है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता को कम करता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य कई बिमारियों से ग्रसित हो जाता है।  युवावर्ग को खासतौर से ऐसे रिश्तों से परहेज करना चाहिए जो अकेलेपन और स्वार्थ भावनाओं की बुनियाद पर बनते हैं क्योंकि ऐसे रिश्ते दुःख और तनाव के साथ कुंठा को भी जन्म देते हैं।

 स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है किः- "जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नही है,  पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है।"

रिश्तों का जिक्र हो और पति-पत्नी के रिश्तों की बात न हो ये संभव नही है क्योंकि ये रिश्ता तो पूरे परिवार की मधुरता का आधार होता है। इस रिश्ते की मिठास और खटास दोनो का ही असर बच्चों पर पङता है।  कई बार ऐसा होता है कि, छोटी-छोटी नासमझी  रिश्ते को कसैला बना देती है। जबकि पति-पत्नी का रिश्ता एक नाजुक पक्षी की तरह  अति संवेदनशील होता है। जिसे अगर जोर से पकङो तो मर जाता है, धीरे से पकङो अर्थात उपेक्षित करो तो दूर हो जाता है। लेकिन यदि प्यार और विश्वास से पकङो तो उम्रभर साथ रहता है।

कई बार आपसी रिश्ते जरा सी अनबन और झुठे अंहकार की वजह से क्रोध की अग्नी में स्वाह हो जाते हैं। रिश्तों से ज्यादा उम्मीदें और नासमझी से हम में से कुछ लोग अपने रिश्तेदारों से बात करना बंद कर देते हैं। जिससे दूरियां इतनी बढ जाती है कि हमारे अपने हम सबसे इतनी दूर आसमानी सितारों में विलीन हो जाते हैं कि हम चाहकर भी उन्हे धरातल पर नही ला सकते और पछतावे के सिवाय कुछ भी हाँथ नही आता। 

किसी ने बहुत सही कहा हैः-  "यदि आपको किसी के साथ उम्रभर रिश्ता निभाना है तो, अपने दिल में एक कब्रिस्तान बना लेना चाहिए। जहाँ सामने वाले की गलतियों को दफनाया जा सके।" 

कोई भी रिश्ता आपसी समझदारी और निःस्वार्थ भावना के साथ परस्पर प्रेम से ही कामयाब होता है। यदि रिश्तों में आपसी सौहार्द न मिटने वाले एहसास की तरह होता है तो, छोटी सी जिंदगी भी लंबी हो जाती है। इंसानियत का रिश्ता यदि खुशहाल होगा तो देश में अमन-चैन तथा भाई-चारे की फिजा महकने लगेगी। विश्वास और अपनेपन की मिठास से रिश्तों के महत्व को आज भी जीवित रखा जा सकता है। वरना गलत फहमी और नासमझी से हम लोग, सब रिश्ते एक दिन ये सोचकर खो देंगे कि वो मुझे याद नही करते तो मैं क्यों करूं.......................


                                        "कोई टूटे तो उसे सजाना सिखो,
                                          कोई रूठे तो उसे मनाना सिखो,
                                          रिश्ते तो मिलते हैं मुकद्दर से,
                                           बस उसे खूबसूरती से निभाना सिखो।" 






Monday, 14 April 2014

जय वीर हनुमान








हनुमान जी की कृपा सब पर रहे इसी कामना के साथ हनुमान जयन्ती के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनायें। 
 हनुमान जी से जुङे प्रसंग को पढने के लिए लिंक पर क्लिक करें।
पवन पुत्र वीर हनुमान


Friday, 11 April 2014

राजनैतिक दल ! पार्टी प्रतीक चिन्ह के प्रति क्या वफादार हैं???


 विश्व के सबसे बङे लोकतांत्रिक देश भारत में होने वाला चुनाव भी सब देशों से निराला होता है। आज देश में कई राजनैतिक पार्टियां अपने-अपने विचारों और मुद्दों के साथ चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेकर लोकतांत्रिक परंपरा का निर्वाह कर रही हैं। विभिन्न पार्टियों की अपनी-अपनी पहचान एक प्रतीक चिन्ह के रूप में होती है। जो कहीं न कहीं उनके विचारों और देश के प्रति जागरुकता को भी परिलाक्षित करती हैं। परन्तु क्या आज के परिवेश में राजनैतिक दल पार्टी प्रतीक चिन्ह के प्रति वफादार हैं?? 

भारत में चुनावों का आयोजन भारतीय संविधान के तहत बनाये गये भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाता है। आज देश के चुनावी दंगल में अनेक राजनैतिक पार्टियां अपने-अपने भाग्य को आजमा रहीं हैं। जबकि प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देते हुए कुछ ही दल स्थापित थे। जहां एक ओर श्यामा प्रसाद मुर्खजी ने अक्टुबर 1951 में जनसंघ की स्थापना की, वहीं दूसरी ओर दलित नेता बी.आर. आम्बेडकर ने अनुसूचित जीति महासंघ को पुर्नीवित किया। जो अन्य दल उस समय आगे आए उनमें आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा परिषद, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी शामिल थी। अपने विचार को गति देने के लिए वर्तमान में उपस्थित राजनैतिक दलों के प्रतीक चिन्हों को जानना आवश्यक है। 

सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का 1885 यानि की स्थापना के समय चिन्ह था, हल के साथ दो बैल तद्पश्चात बदलकर गाय-बछङा हुआ। परंतु वर्तमान में इंदिरा गाँधी की सोच अर्थात शक्ति, ऊर्जा और एकता का प्रतीक हाँथ का पंजा कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है।

दूसरे नम्बर की राजनैतिक पार्टी है भारतिय जनता पार्टी जिसका वर्तमान में चुनाव चिन्ह है कमल। कमल  किचङ जैसी विपरीत परिस्थिती में भी अपने वजूद को कायम रखता है और माता लक्ष्मी के हाँथ में शोभायमान है। परन्तु ये पार्टी पूर्व में यानि की 1951 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुर्खजी द्वारा स्थापित भारतिय जनसंघ के नाम से अस्तित्व में आई थी उस दौरान इस पार्टी का चुनाव चिन्ह दिपक हुआ करता था। 1977 में इसे जनता पार्टी नाम दिया गया जिसका चिन्ह था हलधर किसान। किन्तु 1980 में इसका स्वरूप बदला तभी से भारतिय जनता पार्टी के नाम से कमल के साथ वर्तमान के चुनाव में भी अपना भाग्य आजमा रही है।

कार्लमाक्स के विचारों से प्रभावित एवं देश की रीढ कहे जाने वाले वर्ग अर्थात कृषक वर्ग एवं कामगारों के हित के लिए आवाज बुलंद करने वाली पार्टी भारतिय कम्युनिष्ट पार्टी का अस्तित्व 1952 से आज तक बना हुआ है। इसका चुनाव चिन्ह है, बाली और हसिया।

मजदूर वर्ग के मसीहा कहे जाने वाले मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी ने 1967 से हसिये और हथौङे के साथ खेतिहर मजदूर और कारखानों के मजदूरों की प्रतीक रूप में कार्यरत है। ये पार्टी भरतिय कम्युनिष्ट  का ही हिस्सा थी परन्तु वर्तमान में एक स्वतंत्र पार्टी है।

बाईं ओर देखता हाथी बहुजन समाज पार्टी का चुनाव प्रतीक है। काशीराम द्वारा स्थापित तथा बहन मायावति के प्रयासों से ये पार्टी देश के अल्पसंख्यक और निचली जाती के सुधार हेतु प्रयासरत है। बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिन्ह हांथी, शारीरिक शक्ति और इच्छा शक्ति का प्रतीक है। इस पार्टी का विशेष प्रभाव उत्तर
प्रदेश में है। अन्य प्रदेशों में भी मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में सुदृण मानसिकता के साथ आंशिक रूप से कार्यरत है।

लाल और हरे रंग के झंडे पर साइकिल चुनाव चिन्ह के साथ समाजवादी पार्टी देश में हरियाली और खुशियाली लाने के लिए  क्रन्ति का नारा बुलंद कर रही है।

कांग्रेस पार्टी से अलग हुई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अपने सिद्धान्तों को घङी रूपी चुनाव चिन्ह में प्रर्दशित कर रही है। नीले रंग की रेखिय घङी जिसमें निचे दो पाए तथा ऊपर अलार्म बटन लगा है, घङी के कांटे 10 बजकर 10 मिनट को दर्शा रहे हैं।


प्रचीन भारतीय परंपरा का प्रतीक शंख बीजू जनतादल का चुनावी शंखनाद है। श्री हरि विष्ण् का प्रतीक शंख विजयनाद को दृष्टीगोचर करता है। इसी मनोभाव को आत्मसात करते हुए बिजू जनतादल ने इसे अपने चुनाव चिन्ह के रूप में धारण किया है।

जनता दल (यूनाइटेड) के लिए चुनाव आयोग द्वारा 'तीरका निशान स्वीकृत किया गया है। यह चिह्न अविभाजित जनता दल का था। यह तीर हरे और सफेद रंग के बीच बनी सफेद पट्टी पर बना हुआ है। वास्तव में यह ध्वज जॉर्ज फर्नांडीज़ की समता पार्टी का था। 'तीरइंगित करता है कि पार्टी अपने लक्ष्यभारत को एक धर्मनिरपेक्षसंप्रभुसमाजवादी व लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की ओर प्रयासरत है।

पीले रंग की पृष्ठभूमि पर तेलुगू देशम पार्टी का चुनाव चिह्न 'साइकिलहै। जो समृद्धिखुशी और धन की चमक को परिलाक्षित करता है। 


दो पत्तियों के चुनाव चिन्ह के साथ ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम पार्टी चुनावी रण में अपना भागय आजमा रही है। उक्त चुनाव चिह्न का एक खास इतिहास रहा है। 1987 में एम.जी. रामचंद्रन की मृत्यु के बाद एआईएडीएमके को लेकर जानकी रामचंद्रन और जयललिता के बीच अनबन हो गई। अत: चुनाव आयोग ने दोनों को एमजीआर के उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी की कमान सम्हालने में अयोग्य करार दिया। परिणामस्वरूप दोनों को पृथक चुनाव चिह्न आवंटित किए गए। जानकी रामचंद्रन को 'दो कबूतरतथा जयललिता गुट को 'बांग देता हुआ मुर्गाचुनाव चिह्न दिया गया। हालांकिद्रमुक के शक्तिशाली बनकर उभरने से उक्त मामला हल हो गया और 1989 में जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके को 'दो पत्तियांचुनाव चिह्न आवंटित कर दिया गया।



डीएमके (द्रविण मुनेत्र कङगम) का चुनाव चिह्न दो पर्वतों के बीच से रश्मियां बिखेरते हुए उगता सूरज है।  यह चिह्न सीधे तौर पर द्रविण लोगों के इतिहास और उनकी राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा थाजिसका राजनीतिक नेतृत्व पेरियार ने किया था। 

 अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह राष्ट्रीय तिरंगे के सभी रंगो के साथ दो फूल है एवं पार्टी का नारा है, 'माँमाटी और मनुष्य

जनता दल (सेक्युलर) : जेडी (एस) का चुनाव चिन्ह 'अपने सिर पर धान रखकर ले जाती एक कृषक महिलाहै। पार्टी का प्रचार वाक्य है, 'मूल्य से एकजुटविश्वास से प्रेरित'। चिह्न में महिला को दर्शाना महिलाओं के अधिकारों और अवसरों के प्रति गंभीर होना दर्शाता है।


राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का चुनाव चिह्न 'लालटेनहै। इस चुनाव चिह्न को पार्टी के अनुसार अंधकार के उन्मूलन और प्रकाश व प्रेम का प्रचार करने के लिए उपयुक्त माना जाता है।


पार्टी की मजबूत हिन्दू राष्ट्रवादी भावना की ओर संकेत करता हुआ केसरिया रंग के ध्वज पर 'तीर-कमानशिवसेना का चुनाव चिह्न है। केसरिया रंग हिन्दुत्व का प्रतीक है। पार्टी कार्यकर्ताओं को शिव सैनिक कहा जाता है।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मनसे का चुनाव चिह्न दाईं ओर जाता हुआ 'रेलवे का भाप इंजनहै। झंडे में शीर्ष पर गहरा चमकदार नीला रंगफिर सफेद पट्टीफिर केसरिया रंग के बाद सफेद पट्टी और फिर हरा रंग है। राष्ट्रीय तिरंगे के रंग को आत्मसात करते हुए त्याग-बलिदान, समृद्धि और खुशियाली का प्रतीक है। 


2013 में नवगठित आम आदमी पार्टी (आप) का चुनाव चिह्न 'झाड़ूहै। भ्रष्टाचार मिटाने के उद्देश्य से अस्तित्व में आई इस पार्टी का मानना है कि चुनाव चिह्न झाड़ू के मुताबिक देश में फैले हर प्रकार के भ्रष्टाचार की सफाई करना है।


 प्रथम चुनाव से लेकर आज तक की चुनावी यात्रा में अपनी सरकार स्वंय चुनने का रोमांच नितनई पार्टियों की भीङ में कहीं खोता जा रहा है। आज जिस तरह से नवीन पार्टियां चुनाव तो अपने चुनावी चिन्हों के संदेश को लेकर लङती हैं किन्तु परिणाम आने पर कुर्सी को सर्वोपरी मानते हुए जोङ-तोङ की राजनीति में विश्वास करने लगती हैं। नेताओं के बदलते विचारों से चुनाव चिन्हों की नितीयों पर ग्रहण लग जाता है और पार्टी के प्रतीक चिन्ह मात्र प्रतीक बनकर ही रह जाते हैं क्योकिं आज महिलाओं की सुरक्षा एवं सम्मान तथा देश की खुशहाली एवं मजदूर वर्ग
का हित केवल विचारों में सिमट गया है।  


Tuesday, 8 April 2014

मर्यादा पुरषोत्तम राम



विष्णु के सातवें अवतार राम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ के घर मानवीय रूप में हुआ।  उनका सम्पूर्ण जीवन आदर्शों एवं संघर्षों से युक्त ऐसी धारा है। जिसमें सत्य, प्रेम, मर्यादा एवं सेवा का संदेश प्रवाहित होता है। राम नाम के उच्चारण मात्र से ही शरीर एवं मन में आत्मिक शान्ति का प्रवाह होता है। राम की कुशल राजनीति को स्वतंत्र भारत में फलीभूत करने की कल्पना गाँधी जी ने भी की थी। 

आदर्श व्यक्तित्व के प्रतीक श्री राम सच्चे जनसेवक, आदर्श भाई,  आज्ञाकारी  पुत्र तथा कुशल शिष्य एवं पति के रूप में सभी रिश्तों को सच्चाई से निभाते हुए जनमानस के समक्ष सार्थक उदाहरण प्रस्तुत किया है। रघुनंदन श्री राम नीतिकुशल एवं न्यायप्रिय राजा तथा सुग्रिव के सच्चे सखा हैं। जातिवाद से परे मर्यादा पुरषोत्तम राम ने स्वंय के कष्ट की चिन्ता न करते हुए सदैव जनहित को सर्वोपरि माना। सभी को साथ लेकर चलने वाले श्री राम जी का मनोहारी वर्णन वाल्मिकी जी ने रामायण में संस्कृत भाषा के माध्यम से उल्लेखित किया है। भाषाई और सीमाई बंधनो से मुक्त श्री राम का अलौकिक प्रसंग तुलसीदास जी की रामचरित मानस से भी आगे समुन्द्रों को पार करते हुए कंपूचिया की रामकेर्ति रामायण में, मलेशिया की हिकायत सेरीराम में और थाईलैंड की रामकियेन  आदि में बहुत ही सुन्दर रूप से वर्णित किया गया  है। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहाँ की स्थानिय भाषा में जगजनतारण श्री राम जी की अनुपम छवी का महत्व जन-जन में गूँज रहा है। 


तमिल भाषा में कम्बन रामायण, उङिया में विलंका रामायण, कन्नण में पंप रामायण एवं बंगाली में रामायण पांचाली आदि भारतीय भाषाओं में भी दीनदयाल श्री राम की महिमा का शाब्दिक स्वर प्राचीनकाल से ही अमृतधारा के रूप में प्रवाहित होकर जनमानस के लिेए कल्याणकारी सिद्ध हो रहा है। नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बंगलादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमत्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोकसंस्कृतियों एवं ग्रंथों में आज भी राम वंदनिय हैं। 

मानवीय रूप में अवतरित सत्यसनातन मंगलकारन श्री राम को उनके सद्चरित्र तथा आदर्श युकत जीवन यापन के गुणों के कारण सदैव एवं सर्वत्र पूजा जाता है। मुनिमनरंज्जन, भवभयरंज्जन, असुरनिकंदन सीताराम की महिमा का गुनगान स्वंय भोलेनाथ ने भी किया है। जिस नाम के महान प्रभाव मात्र  से ही जीवन का उद्धार हो जाता है। ऐसे कृपालु भक्त वत्सल्य श्री राम को बारंबार प्रणाम है।  

रामनवमी के पावन पर्व पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं