Thursday, 31 December 2015

2016 का कदम सभी के लिये मंगलमय हो

नव वर्ष 2016 ने सुबह के उजियारे के साथ द्वार पर आहट दी है। इक्किसवीं सदी कदम-दर-कदम चलते हुए अपने 16वें कदम के साथ नई उम्मीदों ओर नई सम्भावनाओं का प्रकाश फैलाने आ गई है। हिमालय की शीतल हवाओं के साथ सुखी जीवन का संदेश लिये, वर्ष 2016 "तमसो मा ज्योतिर्गमय" का गान हवाओं में गुंजायमान है। पक्षियों का कलरव और सागर की उठती-गिरती लहरों का संदेश आगे बढने को प्रोत्साहित कर रहे हैं।  मन में अच्छे विचारों के साथ सकारात्मक एहसास लिये हम सबको भी आगे बढना है।   हम अकेले नहीं हैं, पूरा ब्रह्मांड हम सबका दोस्त है और वो उन्हीं को सबसे सर्वोत्तम देता है जो सपने देखते हैं क्योंकि खुली आँखों से सपने देखने वालों के महान सपने हमेशा पूरे होते हैं। हमें अपने मिशन में कामयाब होने के लिए, अपने लक्ष्य के प्रति एकचित्त निष्ठावान होना पड़ेगा क्योंकि यदि हम अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ हैं तो, हम इतिहास की धारा को बदल सकते हैं। इसी आत्मविश्वास की ऊर्जा के साथ हम सबको नये साल में अपने लक्ष्य को हासिल करते हुए नई इबारत लिखना है। इसलिये मित्रों, उठो जागो तब तक नही रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये क्योकि सच्चा प्रयास कभी निष्फल नहीं होता| अतः नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ कुछ अच्छा सोचें और अपनी सोच को कामयाबी का आसमान छुने दें। 2016 का कदम सभी के लिये मंगलमय हो। 



धन्यवाद
अनिता शर्मा




Wednesday, 30 December 2015

Motivational articles written by Anita Sharma


(1) हम सब अपने-अपने क्षेत्र में कामयाब होना चाहते हैं। उसके लिये हमें सबसे पहले अपने लक्ष्य को निर्धारित करना होगा और साथ ही आसमान छुने का हौसला रखना होगा क्योकि सफलता सरलता से नही मिलती।  रास्ते में जानी अनजानी अनेक बाधाएं सूरसा के मुहँ की तरह आपकी बुद्धिमता और धैर्य की परिक्षा लेने के लिये मिलती रहेंगी। समस्याओं का सामना करने का हौसला रखें और चल पङिये अपनी मंजिल की ओर। पूर्ण लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करेंः-
कोशिश करने वालों की हार नही होती

(2) कुछ पाकर खो देने का डर कुछ न पा सकने का भय, जिन्दगी की गाङी पटरी से उतर न जाए इन्ही छोटी-छोटी चिन्तओं के डर से घिरी रहती है जिन्दगी लेकिन जिस वक्त हम ठान लेते हैं कुछ नया करने का तभी जन्म लेता है साहस। पूर्ण लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करेंः-
साहस

(3) सब कुछ हमारे अनुकूल हो ये संभव नही है। जब हम किसी भी क्षेत्र में कोई भी काम शुरू करते हैं तो, अड़चने भी आती हैं और कार्य गलत भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में तनाव, दुःख और निराशा की चादर ओढ लेने से कभी भी समस्या का समाधान नही होता। कहते हैं भूल इंसान से ही होती है, अतः ऐसी परिस्थिति में जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को समेट कर खुशनुमा  माहौल में असफलता के कारणों को समझते हुए उसके निदान पर विचार करना चाहिये। पूर्ण लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करेंः-
हजार परेशानियों का हल, खुश रहना


(4) हम सबके भीतर अजस्र ऊर्जा शक्ति छिपी पङी है जिसे न तो हम 
पहचान पाते हैं और ना ही उसका समुचित उपयोग कर पाते हैं। जिस तरह से एक छोटे से बीज में एक बङा वृक्ष बनने की हर क्षमता होती है लेकिन कई बार सही पोषण न मिलने से वो अपने प्रारंभकाल में ही दम तोङ देता है। उसी तरह मनुष्य में भी अपार संभावनाये हैं जो कुछ तो वातारण के कारण पल्लवित नही हो पाती, तो कुछ उसके स्वयं के आलसी व्यवहार के कारण। अक्सर ये भी देखा जाता है कि अपार ऊर्जा के बावजूद कई लोग असफलता के डर से आगे बढने की हिम्मत नही करते। दर असल कमी संसार में नही है कमी तो हमारे मन में है। यदि हम चाहें तो बिगङे काम भी बना सकते हैं।पूर्ण लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करेंः-

(5) यदि हम किसी को आगे बढाना चाहते हैं तो उसके अच्छे कामो की प्रशंसा करें। उसे आगे बढाने के लिए प्रोत्साहित करें। नाकामियां तो उस रात की तरह है जिसे प्रोत्साहन रूपी प्रकाश से दूर किया जा सकता है। पूर्ण लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करेंः-
सफलता के रास्ते में प्रोत्साहन एक अचूक औषधी है


हर रात के बाद सुबह होती है। जिन्दगी हँसाती भी है रुलाती भी है,जो हर हाल में आगे बढने की चाह रखते हैं जिन्दगी उसी के आगे सर झुकाती है। हम जो भी कार्य करना चाहते हैं उसकी शुरुवात करें, आने वाली बाधाओं को सोच कर बैठ न जाएं। पूर्ण लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करेंः-
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

धन्यवाद 
अनिता शर्मा 









Monday, 28 December 2015

Memorable Articles written by Anita Sharma

उम्मीद या आशा तो जीवन का वो अंग है जिसको अपनाने से सकारात्मक परिणामों का आगाज होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टी से तो आशाए या उम्मीद तो एक ऐसा उपचार है, जो अवसाद में चले गये लोगों के लिये रामबांण दवा का काम करता है। पूरा लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें -  आशाओं का दीप जलाएं


आज के इस ई युग में बुद्धिमता का पैमैना भी बदल गया है। बच्चों की परवरिश का तरीका भी बदल रहा है। नित नये इज़ात होते एप ने माँ की लोरी का स्थान भी ले लिया है। डिजिटल क्लासेज ने बस्ते का भार कम कर दिया है। यदि वास्तविकता के चश्में से देखें तो, बच्चों का बचपन दूर हो रहा है। आजकल बच्चे जानकारियों को याद करने के बजाय गुगल या विकीपिडिया पर ढूंढना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जहाँ एक ही जानकारी कई लोगों द्वारा अपलोड होने से उसमें थोङा बहुत अंतर भी होता है। ऐसे में वास्तविक ज्ञान में कनफ्यूजन होना स्वाभाविक है। पूरा लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें -  डिजिटल इंडिया


मेरे मन में बाल अपराध को लेकर कुछ मंथन चल रहा है इसलिये मैने अपनी पूर्व की लाइन में शायद शब्द का इस्तमाल किया है क्योंकि ये जो बाल अपराध का ग्राफ दिन-प्रतिदिन बढ रहा है, उसके लिये जिम्मेदार क्या सिर्फ नाबालिग बच्चे हैं ! या समाज और परिवार भी। आज हम सब एक सभ्य सुंदर और सुसंस्कृत भारत की कल्पना करते हैं।  सुरक्षित वातावरण की भी कामना रखते हैं किन्तु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार कर देते हैं। मेरा मानना है कि, कोई भी शिशु जन्म से अपराधी नही होता उसके लिये अनेक कारण समाज में विद्यमान हैं।
 पूरा लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें -
आज के बालक भारत का भविष्य हैं


कैंसर से भी गम्भीर बिमारी से ग्रसित हमारी दकियानुसी रुढीवादी सोच का कुठाराघात बेटीयों पर जन्म से ही होने लगता है। अनेक जगहों की प्रथा के अनुसार बेटा होने पर उसका स्वागत थालियों, शंख तथा ढोल बजाकर करते हैं वही बेटी के जन्म पर ऐसा सन्नाटा जैसे कोई मातम मनाया जा रहा हो। ऐसी बेमेल धार्मिक परंपराएं जहाँ माताएं बेटे की लंबी उम्र के लिए उपवास और धार्मिक अनुष्ठान करती हैं वहीं बेटी की खुशहाली या लंबी उम्र के लिए कोई व्रत या अनुष्ठान नही होता। जन्म से ही भेद-भाव का असर दिखने लगता है बेटीयों को उपेक्षित तथा बेटों को आसमान पर बैठा दिया जाता है।  पूरा लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें -  रुढीवादी सोच को अलविदा कहें

बचपन से ही बेटों को नारी के सम्मान और आदर की घुट्टी पिलाएं जिससे बेटीयों के प्रति हो रही विभत्स घटनाओं का अन्त हो सके।
सोचियेयदि बेटी न होगी तो बहन नही होगी, न माँ, न समाज, न देश होगा, न दुनिया होगी, फिर किस चाँद पर जायेंगे और और कौन सी दुनिया बसाएगें ???? मित्रों, सच तो ये है कि, बेटी है तो कल है, वरना विराना पल है। पूरा लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें -   बेटी है तो कल है

धन्यवाद 
अनिता शर्मा 





Thursday, 24 December 2015

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और महामना मदन मोहन मालवीय जी को नमन


सरस्वती पुत्र, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय जी के जन्मदिन पर शत् शत् नमन। महान व्यक्तित्व से परिपूर्ण ये माहान विभूतियां भारत का गौरव हैं। दोनों ही विभूतियों का जीवन हम सबके लिये प्रेरणा स्रोत है। उनका सम्पूर्ण जीवन ऐसा विद्यालय है, जिससे हम सब शिक्षा लेकर अपने जीवन को सार्थक और सफल बना सकते हैं। 

जन जन के प्रिय कवि और राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी जी की प्रसिद्ध कविता “कदम मिलाकर चलना होगा एक ऐसी कविता है जो अनेक परेशानियों में सकारात्मकता का प्रांण फूंकती है.... 

                                                बाधायें आती हैं आयें
                                                 घिरें प्रलय की घोर घटायें
                                                 पावों के निचे अंगारे 
                                            सिर पर बरसे यदि ज्वालायें 

                                              निज हाथों में हंसते-हंसते
आग लगाकर जलना होगा। 
कदम मिलाकर चलना होगा। 

हास्य-रूदन में, तूफानों में
अगर असंख्यक बलिदानों में
उद्यानों में, वीरानों में
अपमानों मेंसम्मानों में
उन्नत मस्तक, उभरा सीना
पीड़ाओं में पलना होगा। 
कदम मिलाकर चलना होगा। 

उजियारे में, अंधकार में
कल कहार में, बीच धार में
घोर घृणा में, पूत प्यार में
क्षणिक जीत में, दीघर हार में
जीवन के शत-शत आकर्षक
अरमानों को ढ़लना होगा। 
कदम मिलाकर चलना होगा। 


सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ
असफल, सफल समान मनोरथ
सब कुछ देकर कुछ न मांगते
पावस बनकर ढ़लना होगा। 
कदम मिलाकर चलना होगा। 


कुछ कांटों से सज्जित जीवन
प्रखर प्यार से वंचित यौवन
नीरवता से मुखरित मधुबन
परहित अर्पित अपना तन-मन
जीवन को शत-शत आहुति में
जलना होगा, गलना होगा। 
कदम मिलाकर चलना होगा।

आदरणिय अटल जी के बारे में अधिक जानने के लिये दिये गये लिंक पर क्लिक करेंः- 



आज हम मदन मोहन मालवीय जी का एक किस्सा आप सबसे सांझा कर रहे हैं। 

धैर्यवान महामना मदन मोहन मालवीय जी

एक बार कुछ अंग्रेज शिक्षाविद् बनारस आए हुए थे। उन्होने काशी हिंदु् विश्वविद्यालय देखने की इच्छा जाहिर की। मालवीय जी ने उन्हे विश्वविद्यालय की एक-एक इमारत दिखाई और विस्तार से सबके बारे में उन्हे समझाते भी रहे। सिर्फ एक इमारत बाकी रह गई थी, वह थी इंजीनियरिंग कॉलेज की इमारत। चुंकी मालवीय जी को किसी जरूरी बैठक में जाना था , अतः उन्होने प्रो.टी.आर. शेषाद्रि से कहा कि आप इन महानुभावों को इंजीनियरिंग कॉलेज दिखा दें।

प्रो. शेषाद्रि बोले- " अब तो शाम हो गई है। शायद कॉलेज भी बंद हो गया होगा।"
फिर भी मालवीय जी ने कहा-  "कोई बात नही, वहाँ कोई चपरासी तो होगा ही।"

शेषाद्रि जी ने फिर शंका व्यक्त की - " बहुत संभव है कि इस समय कोई चौकीदार भी न हो। "

मालवीय जी ने उसी धैर्य से कहा - "फिर भी ये लोग बंद दरवाजों में लगे काँच से ही झांक कर देख लेंगे। आप इन्हे ले जाइये।"

मालवीय जी और प्रो. शेषाद्रि की वार्तालाप सभी अंग्रेज शिक्षाविद् मेहमान सुन रहे थे। मालवीय जी के शांत और धैर्यपूर्वक उत्तर को सुनकर, उनमें से एक ने कहा - अब मेरी समझ में आया कि किस प्रकार इतने बङे विश्वविद्यालय का का निर्माण हुआ होगा। 

सच है मित्रों, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी के धीरज का ही परिणाम है, बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय जिसके निर्माण का संकल्प उन्होने इलाहाबाद के कुंभ मेले में वहाँ आये हुए श्रद्धालुओं के बीच लिये थे। वहीं पर एक वृद्धा ने उनको इस कार्य हेतु पहला चंदा दिया था। महान विभूती पं. महामना मदन मोहन मालवीय जी के बारे में विस्तार से पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें :-







Tuesday, 22 December 2015

निर्भया को नही मिला इंसाफ


निर्भया एक ऐसा नाम जिसने देश में सभी को एक ज्योति के तले ला खड़ा किया था। 16 दिसम्बर 2012 को निर्भया को ऐसी विकृत मानसिकता ने घायल किया कि वह परलोक सिधार गई; किन्तु अपने पिछे कई प्रश्न   हमारी न्यायपालिका और कार्यपालिका  तथा समाज के लिये छोड़ गई .........
क्या उसका लड़की होना अपराध था?????  
क्या उसे आगे बढने और सफल होने का अधिकार नही था???? 
क्या न्याय माँगना अपराध है???? 

आज जिस तरह बेटी बचाओ और बेटी पढाओ का नारा लगाया जा रहा मुझे तो बस ये नाटक नजर आ रहा है क्योंकि जहाँ बेटीयों को स्वतंत्र और निर्भय आसमान न हो वहाँ बेटी को कोख में बचा भी लिये और पढा भी दिये तो उस दुषित मानसिकता से कैसे बचाओगे जिसे नाबालिग कहकर छोड़ दिया जाता है। बालिगों जैसे अपराध को अंजाम देने वाले अपराधी को समय रहते सजा न देना, कानून में परिवर्तन न करना यहि दिखाता है कि सरकार, समाज और न्यायपालिका को इसकी कोई चिंता नही है। अगर बेटियों की इतनी ही चिंता होती तो 2012 से 2015 तक के बीच में  समय रहते सदन के सभी सदस्य सजगता दिखाते और जुवेनाइल जस्टिस बिल (किशोर न्याय अधिनियम) पास हो चुका होता; जिससे निर्भया को इंसाफ मिलता। सबसे क्रूर मानसिकता वाला अपराधी; नाबालिग कानून के तहत रिहा नही होता।  और तो और सबसे बङी विडंबना ये है कि न्याय के लिये गुहार लगाने पर निर्भया के माता-पिता को हिरासत में ले लिया गया। इस तरह की कार्यप्रणाली हमारे जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता क्या है,  इस पर एक प्रश्न चिन्ह लगाती है।  आज इसपर विचार करना बहुत जरूरी है क्योंकि उनकी कथनी और करनी  एक समान नजर नही आ रही है। 

आज सरे आम बेखौफ दुषित मानसिकता का प्रहार बेटीयों और महिलाओं पर हो रहा है फिर भी हमारी सरकार, समाज और न्याय व्यवस्था; कानून तथा साक्ष्य की ही दुहाई दे रही है। निर्भया जैसी कई बेटियां हैं जिन्हे इंसाफ नही मिल रहा है। एक वहशी दरिंदे की शिकार बेटी किस मनोस्थिती से गुजरती है वह दर्द अकल्पनिय है तथा ऐसे दरिन्दों को माफ कर देना समाज में जहर फैलाने के समान है। 

मित्रो, बेटी शब्द सुनकर मेरे मन में अनायास ही प्रेम , दुलार, ममत्व और करुणा की प्रतिमूर्ति नजर आने लगती है। जीवन को जीने के मायने सिखाने वाली बेटी एक नही दो कुलों का मान होती है। बेटी तो निःश्चल प्रेम की अविरल धारा है। परन्तु आज जिसतरह से उसकी सुरक्षा को लेकर अनदेखी की जा रही है तो वो दिन दूर नही जब ये धारा, धरा पर से विलुप्त ही हो जायेगी, क्योंकि कोई माँ अपनी बेटी को उस संसार का हिस्सा नही बनने देगी जहाँ जिवन तो है पर जीने की आजादी न हो। कोख से लेकर जिवन पर्यन्त जहाँ अनेकों यम बेटी को निगलने को तैयार हों वहाँ बेटी के किस भविष्य को हम संवारेगे या उसे किस दुनिया का सपना दिखायेंगे?

अतः एक महिला होने के नाते मेरा अनुरोध है , आज के आधुनिक शिक्षित सभ्य समाज, सरकार और न्याय व्यवस्था से कि, यदि यथार्त में बेटी बचाओ बेटी पढाओ को सार्थक करना चाहते हैं; तो ऐसी व्यवस्था का विस्तार करें जहाँ बेटियों को सुरक्षित और सभ्य आसमान मिले, निर्भया जैसी सभी बालिकाओं को इंसाफ मिले। 

16 दिसम्बर 2012 की पोस्ट पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें
एक आवाज
प्रश्न ये उठता है कि क्या! अमानवीय कृत्यों वाले इंसान अलग दुनिया से आते हैंनही मित्रों, ये भी उसी समाज के अंग हैं, जिस समाज में हम और आप रहते हैं।  जब हम महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को सुनते हैं तो मन में ख्याल आता है कि हम किस समाज में रह रहे हैं, स्त्रियों के प्रति ऐसी सोच क्यों?







Sunday, 13 December 2015

दृष्टीबाधिता अभिशाप नही है


आज हम सब डिजिटल इण्डिया में अपने विकास का प्रतिबिंब देख रहे हैं। उसी के अन्तर्गत वाट्सएप क्रांती एक नया आयाम रच रही है, जहाँ अनेक ऐसे ग्रुप नजर आ जायेंगे जो अनेकता में एकता का प्रतिक है। जहाँ एक भारत नज़र आता है। ऐसा ही हम लोगों का भी वाट्सएप ग्रुप है वाइस फॉर ब्लाइंड(Voice for blind),  जिसके सभी सदस्य विभिन्न धर्म , जाति और प्रांत के हैं। संचार क्रंति के महत्व को समझते हुए हम सबके मन में विचार की एक नई क्रांति का उदय हुआ और उसके मद्देनज़र वाइस फॉर ब्लाइंड  ग्रुप पर सात दिन की विचार  गोष्ठी का आयोजन किया गया।विचारों का आदान प्रदान 3 दिसम्बर से 10 दिसम्बर तक चला। संगोष्ठी का विषय था, "विकलांगता को नई टेक्नोलॉजी के साथ मुख्यधारा में लाना"  जिसमें हमारे अनेक निःशक्त साथियों ने बढ चढ कर हिस्सा लिया और अपने विचारों तथा अनुभवों के सूरों को नित नये आयाम का आधार दिया। आयोजन का महत्वपूर्ण बिन्दु था कि समाज तथा सरकार द्वारा विकलांगता के क्षेत्र में हो रही उदासिनता को कैसे दूर किया जाये क्योंकि विकलांगता कोई अभिशाप नही है। कहते हैं "एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाये " इसी बात को ध्यान में रखकर हमारा विशेष ध्यान दृ्ष्टीबाधित लोगों पर रहा। उनके विकास में आने वाली समस्याओं और उनका क्या निदान हो सकता है, इसपर विशेष चर्चा हुई। 
 
सप्तदिवसिय संगोष्ठी, सप्तरिषी मंडल की आभा की तरह ज्ञान के विचारों से प्रकाशमान रही। हर किसी का जज़बा आसमान छुने का था। मन में अच्छे विचार लिये विवेकानंद जी  का भारत काल की चाल को बदलने के लिये तद्पर था। 
समस्याओं के बीच में भी हर किसी के मन में समाधान का जज़बा था क्योंकि वे विज्ञान की नई टेक्नोलॉजी के साथ इतिहास रचने को तैयार हैं। सप्तसुरों के आरोह एवं अवरोह के क्रम में जिवन के सभी उतार चढाव पर विचार विमर्श हुआ। जैसे कि, उनका रहन-सहन, ब्रेल लिपी का महत्व, व्हाइट केन की प्रासंगिता तथा शिक्षा एवं जॉब में आ रही परेशानियों पर चर्चा हुई। इसके साथ ही यातायात में आ रही दिक्कतें तथा उनके निदान पर सुझाव भी आये। सुझावों को व्यवहार में लाने के लिये समाज और सरकार का साथ मिल जाये तो, निःसंदेह दृष्टीबाधित लोगों की समस्या का समाधान पलभर में हो सकता है। 


विकास के इस दौर में दृष्टीबाधिता के क्षेत्र में मुश्किले सूरसा के मुख की तरह हैं फिर भी अनेक सदस्य अपनी दृष्टीबाधिता को नकारते हुए आज समाज में नयी पहचान बना रहे हैं। राह आसान नही है फिर भी उनका मानना है कि,  "ऑधियों को जिद्द है जहाँ बिजली गिराने की हमें भी जिद्द है वहीं आशियां बसाने की" 

जन्म लेते ही यदि दृष्टी नही है तो सबसे पहले परिवार की हताशा और अवहेलना का एहसास। थोड़े बड़े हुए तो पड़ोसियों के कटाक्ष भरे शब्दों ने घायल किया। शिक्षा प्राप्त करने की राह में समाज और सरकार की उदासीनता, जीवन में अमावस का चाँद बन गई। यदि अनेक बवंडरों को पार करते हुए शिक्षा ग्रहण कर भी लिये तो रोजगार की समस्या, रेत में पानी ढूंढने के समान है। सबसे बड़ी विडंबना तो तब होती है जब बौद्धिक क्षमता के बावजूद ज्ञान की अग्नि परिक्षा से लगभग हर दृष्टीबाधित विद्यार्थी को गुजरना पड़ता है क्योंकि आज के शिक्षित समाज के जह़न में यही प्रश्न रहता है कि, दृष्टी बिना विकास कैसे????
 
मित्रों, सच तो ये है कि विज्ञान की नई टेक्नेलॉजी उनकी आँखे हैं और आगे बढने का जज़बा हर दिन जिंदगी को एक नया ख्वाब देता है। इस दुनिया में कोई भी परफैक्ट नही होता। हर किसी में  कुछ कमी है तो कुछ प्रतिभा भी होती है। किन्तु मंजिल उन्ही को मिलती है जिनके सपनो में जान होती है पंखो से कुछ नही होता हौसले से उड़ान होती।

As far as we are concerned, Disability means Possibility


आज जिस तरह से विज्ञान की टेक्नोलॉजी किसी से भेद-भाव नही करती हर किसी के जीवन की राह आसान करती है, उसी तरह समाज और परिवार का भी हर किसी के साथ सहयोग का भाव हो तो शारिरिक अक्षमता के बावजूद विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है।जीवन में असली सफलता हम तभी हासिल कर सकते हैं, जब हम दूसरों को सफल होने में मदद करना सीख लेते हैं। तो दोस्तों, आइये हम सब मिलकर कुछ अच्छा सोचें , कुछ अच्छा करें खुद को एवं अपनी सोच को समभाव का आसमान छुने दें क्योंकि किसी की मदद करने के लिये केवल धन की जरूरत नही होती, बल्की उसके लिये एक अच्छे मन की जरूरत होती है।

गौतम बुद्ध ने कहा है कि , किसी और के लिये दिया जलाकर आप अपने रास्ते का भी अंधेरा दूर करते हैं।

Kindness is a language which deaf can hear and blind can see 

धन्यवाद :) 
  

Saturday, 5 December 2015

जागो भारत जागो


हमारा देश भारतवर्ष   तीर्थकंर ऋष्भनाथ के पुत्र भरत के नाम का प्रतीक है। भारतवर्ष में कृष्ण की बांसुरी का मधुर स्वर तो कहीं राम की मर्यादा का पाठ पढाया जाता है। नानक की वाणीं और कूरान की आयतें सुबह की पहली किरण पर सवार होकर वातावरण को सकारात्मक बनाती हैं। कबीर और विवेकानंद के देश में, मंदिर की घंटी और मस्जिद का अज़ान गुंजायमान होता है। भारत के गौरव, प्रेमचंद और निराला जी की रचनाओं में भारत के समाज की पीढा नज़र आती है। उनके शब्दों में नारी का दुःख और वृद्धा की कराह नजर आती है। मैथली शरण गुप्त जी की कविताएं देशप्रेम का अलख जगाती हैं। जयशंकर हों या भारतेंदु हरिश्चन्द्र, कालीदास हों या चाण्क्य, हर किसी का गौरव है भारतवर्ष और बुद्धीजीवियों की रचनाएं, भारत के भाल का तिलक हैं। 

मित्रों, अनेकता में एकता का प्रतिक भारत पर  विगत कुछ समय से चन्द लोगों की वज़ह से एक ऐसा वायरस फैलाया जा रहा है, जो किसी के लिये भी हितकर नही है। इतिहास गवाह है कि भारतवर्ष हिन्दुत्व का गण रहा है, फिरभी भारत ने हमेशा अपनी उदारता से "अतिथी देवो भवः" पर ही विश्वास किया है। इसी का परिणाम है कि यहाँ विभिन्न जाति, धर्म और समप्रदाय फल फूल रहे हैं। भारतवर्ष की सहिष्णुता का ही प्रतीक है, कुतुबमिनार तथा ताजमहल। भारत में रहने वाले सभी भारतीय एक हैं और इनमें से किसी एक पर भी यदि कोई कुठाराघात होता है, तो उसकी पीढा हम सबको होती है। लेकिन जिस तरह से आज-कल बुद्धीजीवी वर्ग विरोध कर रहा है, वो हमारी भारतीय परंपरा को घायल कर रहा है। जिस देश की आत्मा में "वसुधैव कुटुंबकम"  का वास है, उस देश में कुछ साहित्यकारों ने अपना सम्मान लौटाकर ये दिखा दिया कि उनका अपना एक  अलग समाज है क्योंकि मैने इसके पहले अनेकों निर्भया की सिसकियों पर किसी को भी सम्मान लौटाते नही देखा। 1984 का दंगा शायद ही कोई भूला होगा। जिसमें एक खास वर्ग पर ऐसा हमला हुआ जिसने औरंगजेब की क्रूरता को जिवंत कर दिया था। मन में ये प्रश्न उठना लाज़मी है कि, आज भी हमारी बेटियां शैतानी हवस का शिकार हो रही हैं, किन्तु उनकी इफाज़त के लिये क्यों नही कोई अपना सम्मान वापस करता???

सबको समान अधिकार और अभिव्क्ति की स्वतंत्रता वाले देश में आज शाहरुख तथा आमीर जैसे कलाकारों को असहिष्णुता नज़र आती है। जबकी इसी देश में वो जीरो से हिरो बने तथा शौहरत कमायें हैं। आज असहिष्णुता के नाम पर जो लोग भारत को बदनाम कर रहे हैं, उनकी मनोवृत्ति अभिमानी है एवं दुषित राजनीति से प्रेरित है। इनका व्यवहार तो "जिस थाली में खाये उसी में छेद करना" जैसी कहावत को चरितार्थ कर रहा है। 

मित्रों, मेरा मानना है कि, देश का बुद्धीजीवी वर्ग चाहे वो साहित्यकार हो, फिल्मी दुनिया से जुङा हो या विज्ञान से किसी भी क्षेत्र का हो, उसे धर्म, जाति या राजनीती के दलदल में नही फंसना चाहिये। उनके व्यक्तित्व में भारतियता का आईना नज़र आना चाहिये क्योकि वो समस्त राष्ट्र के गौरव होते हैं न की किसी एक जाति विशेष के। मेरा अुनरोध है उन सभी कलम के सिपाही से कि, कलम की ताकत को सृजनात्मक लेखन की ताकत बनायें जो विकट से विकट परिस्थिति में भी भाई-चारे का सूरज उदय करे। लिखये उस व्यवस्था पर जो जघन्य अपराध के बाद भी अपराधी को उम्र के आधार पर नाबालिग कहकर छोङ रही है। लिखिये उस बेटी के हक पर जो सिमटी सहमी अपनी दुर्गति की चादर ओढे कहीं सिसक रही है। आइये हम सब मिलकर ज्ञान के गुरु भारतवर्ष को गौरवान्वित करें तथा एक भारत श्रेष्ठ भारत को साकार करें।
जय शंकर प्रसाद जी कविता से कलम को विराम देते हैंः- 
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को 

मिलता एक सहारा।


सरस तामरस गर्भ विभा पर 
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर 

मंगल कुंकुम सारा।। 

                

 जय भारत जय हिन्द 
    अनिता शर्मा
voiceforblind@gmail.com                                           

(ये लेख मेरी निजी राय है, जिसे मैने संविधान की  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर लिखा है, आशा करते हैं मेरी भावना किसी को आहत नही करेगी) 

Monday, 30 November 2015

समाज और सहयोग की भावना को सलाम

मित्रों, दृष्टीबाधित लोगों की सहायता हेतु आपकी भावना का स्वागत करते हैं। आशा करते हैं कि,  वर्तमान में सम्मलित  सभी सदस्य ये पढ चुके होंगे कि,  दृष्टीबाधितों  की सहायता कैसे करनी है।बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की भावना, भारत की आवो हवा में है। फिल्मों ने भी अपनी भूमिका में मिलजुल कर कार्य करना तथा समाज के लिये कार्य करने की प्रवृत्ति को बहुत ही सुंदर ढंग से चित्रित किया है। नया दौर का प्रसिद्ध गाना "साथी हाँथ बढाना एक अकेला थक जायेगा मिलकर बोझ उठाना"  लगभग हम सभी की जुबान पर है। 

अक्सर हम सबने महसूस किया होगा कि परिवार में जो बच्चा सबसे कमजोर होता है माँ का उस पर विशेष स्नेह होता है। ऐसे ही स्नेह की अपेक्षा हमारे दृष्टीबाधित साथी भी चाहते हैं, जहाँ उन्हे दया नही बल्की आगे बढने के लिये सहयोग का हाँथ चाहिये।

आज सरकार द्वारा अनेक सुविधायें देने की बात कही जाती है, किन्तु ये सुविधायें और योजनायें सिर्फ मंत्रालय की फाइलों मे ही सिमट कर रह गईं हैं तथा चंद शहरों या चंद संस्थानों की ही अमानत है। आज भी अनेक शहरों में दृष्टीबाधित बच्चे उन योजनाओं से वंचित है, जैसे कि परिक्षा के समय सहलेखक को दिया जाने वाला भत्ता हो या रेर्काडिंग की सुविधा। सबसे बड़ी विडंबना है कि, सरकार द्वारा पारित योजनाओं को सरकार के ही अधिनस्त कर्मचारी नही मानते और अपने मन की करते हैं। जिसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जिनकी कोई गलती नही है। दृष्टीबाधिता हो या किसी भी प्रकार की शारीरिक विकलांगता, सरकार तथा समाज की उदासीनता की बली चढ जाती है।

कहते हैं सिक्के के हमेशा दो पहलु होते हैं , सिक्के  के दूसरे पहलू में सहयोग का भाव लिये आप सब नये सदस्यों  की सामाजिक चेतना से दृिष्टीबाधित बच्चों को सकारात्मक  दिशा मिलेगी। नव जागरुक सदस्यों से कुछ आवश्यक बातें कहना चाहेंगे। मित्रों, स्पष्ट किये गये सभी कार्य अपना एक विशेष महत्व रखते हैं, परंतु दो कार्य अति महत्वपूर्ण है। 

1- सहलेखन (scribe) या कहें राइटर और पाठ्य पुस्तक (study materials) की रेर्काडिंग (recording) विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि मित्रों ये कार्य समय सीमा में करना होता है तथा इस पर दृष्टीबाधित बच्चों का भविष्य निर्भर है। जो पुस्तकें record के लिये आती हैं उसे लगभग एक महिने में रेकार्ड करके वापस करना होता है ताकि परिक्षा के एक महिने पहले उनको पाठ्य सामग्री ऑडियो (audio) में मिल जाये, जिसे  सुनकर वे याद कर सकें और परिक्षा में अपना अच्छा प्रदर्शन कर सकें।

2- दूसरी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है परिक्षा के समय सहलेखकों की, उनको परिक्षा की समय सारिणी के अनुसार परिक्षा स्थल पर पहुँचना। 

हमें विश्वास है कि जो भी सदस्य इन दो अति महत्व पूर्ण कार्य के लिये उत्सुक हैं वो अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभायेंगे।  Recording के इच्छुक सदस्य अपनी आवाज की एक ऑडियो क्लिप हमें मेल करें।
यदि आपके मन में कोई भी अन्य जिज्ञास (query) है तो, आप हमें मेल कर सकते हैं। पुनः आपके सहयोग की जागरुकता को सलाम करते हैं। निःसंदेह हम सब मिलकर दृष्टीबाधित लोगों के जीवन को अवश्य रौशन करेंगे।  

जय शंकर प्रसाद जी कहते हैं कि,
औरों को हँसते देखो मनु
हँसो और सुख पाओ
अपने सुख को विस्तृत करलो
सबको सुखी बनाओ 

Mail ID:-  voiceforblind@gmail.com
                    

Thursday, 19 November 2015

हजार परेशानियों का हल, खुश रहना


दोस्तों, जीवन है तो उसमें सभी तरह के रंग-रूप रहेंगे। इस धरती पर कोई भी ऐसा नही है, जिसे कभी किसी परेशानी का सामना न करना पड़ा हो। जीवन में सब परफैक्ट हो ऐसा कम ही होता है।  सुख दुःख , हानि-लाभ, सफलता-असफलता तो रात दिन की तरह हम सबके साथ चलती है। ऐसे में स्वंय को संतुलित रखते हुए, हर परिस्थिती में खुश रहते हुए  दूसरे लोगों को भी खुश रखने का प्रयास करना चाहिये। ये विश्वास रखे मन में कि हर रात के बाद सुबह होती है। जीवन में जब सब कुछ अच्छा होगा तभी हम खुश होंगे, ये विचार मन से निकाल देना चाहिये।

मित्रों,सब कुछ हमारे अनुकूल हो ये संभव नही है। जब हम किसी भी क्षेत्र में कोई भी काम शुरू करते हैं तो, अड़चने भी आती हैं और कार्य गलत भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में तनाव, दुःख और निराशा की चादर ओढ लेने से कभी भी समस्या का समाधान नही होता। कहते हैं भूल इंसान से ही होती है, अतः ऐसी परिस्थिति में जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को समेट कर खुशनुमा  माहौल में असफलता के कारणों को समझते हुए उसके निदान पर विचार करना चाहिये। जीवन में मौके बहुत आते हैं। यदि भूलवश कुछ मौके हाँथ से निकल जाये या गलती हो जाये तो,  पछताने के बजाय या अवसाद में जाने के बजाय, दूसरे मौके को सकारात्मक खुशी के साथ संभव करने का प्रयास करना चाहिये। 

जिन्दगी में उतार चढाव तो लगे रहते हैं ई सी जी में भी  सांसों की रफ्तार ऊपर-नीचे आती जाती नजर आती हैं। यदि सांसो की गति सपाट हो जाये तो ये मृत्यु का ही संकेत देती है। दोस्तो , जीन्दगी में मुश्किलें तो तमाम है और जीना भी हर हाल में है, तो मुस्करा कर जीने में क्या नुकासान है। सच तो ये है दोस्तों कि, खुश रहने का मतलब ये नही है कि सब ठीक है बल्की ये व्यवहार, ये दर्शाता है कि आपने जीवन जीना सीख लिया।

मित्रों, हम सबको खिला हुआ मुस्कुराता हुआ फूल ही अच्छा लगता है।मुरझाये फूल की तरफ कोई नही देखता, तो फिर तनाव और दुःखनुमा चेहरा लेकर हम कैसे सफल हो सकते हैं क्योंकि तनाव और दुःखी चेहरों को सिर्फ हमदर्दी मिलती है, सार्थक सहयोग नही। खुशनुमा चेहरा तो उस फूल की तरह होता है जिससे सब प्रभावित होते हैं और परेशानियों को दूर करने में हर संभव मदद करते हैं। जीवन की परेशानियां और असफलतायें तो हवा की आँधियाँ हैं जो वक्त के साथ चली जाती है। खुशियों का भाव तो ताजी हवा का झोंका है जो हर पल को खुशनुमा बनाता है। जब तक आप खुद नहीं चाहें खुशियां कभी खत्म नही होती। तो दोस्तों जीवन की छोटी छोटी खुशियों को समेटते हुए बड़ी से बड़ी परेशानियों का हल ढूंढे। मदर टेरेसा कहती हैं कि, सफलता और शांति की शुरुआत मुस्कान से होती है।

आपने जो चाहा वो आपको मिल गया, ये तो है सफलता।  लेकिन आपको जो मिला उसे चाहना ही सच्ची खुशनुमा सफलता है। जब एक हल्की सी मुस्कान से फोटो अच्छी हो सकती है ,तो जिंदगी क्यों नही! सुंदरता का सबसे अच्छा आभूषण है, आपकी मुस्कान। हजार परेशानियों का हल है, खुशनुमा व्यवहार। हम सब वास्तविकता में हमेंशा अपने दुःख को ही गिनते हैं, इसके बजाय यदि हम अपनी खुशियों को गिने तो पायेंगे कि, कुदरत ने हमें कितनी ज्यादा खुशियाँ दे रखी हैं। खुशी सब दवाओं में सर्वोत्तम दवा है। इसलिये खुश रहें और खुशियाँ बांटे। 





Monday, 9 November 2015

भारतीय संस्कृति का प्रतीक है; दिपक


भारतीय संस्कृति में दिपक का विशेष महत्व है। भारत के जन-मन में बसे पर्व दीपावली पर तो दिपों का विशेष महत्व हो जाता है। दिपों की अंनत माला के  प्रकाश से  मानव जीवन के संघर्ष, निराशा एवं कुंठा के मध्य आशा की नई ऊर्जा का संचार होता है। दिपक की तुलना तो गुरु से भी की गई है क्योंकि अज्ञान रूपी तिमिर को गुरु समान दिपक, अपने प्रकाश से रौशन करता है। आदिमानव के आग के आविष्कार के बाद से समस्त मानव जाति ने दिपक को तम से प्रकाश का वाहक स्वीकार किया है। सुख सौभाग्य के प्रतीक के रूप में  सभी धार्मिक अनुष्ठानों में  दिपक की ज्योति सर्वप्रथम प्रज्वलित की जाती है ।


दिपों का महत्व तो संगीत, कला एवं साहित्य में भी जिवंत है। राग दिपक हो या रागमाल चित्र हर जगह दिपक की ज्योति विद्यमान है। साहित्यकारों की रचनाओं में दिपक, एक प्रिय उपमान के रूप में प्रज्वलित है।

मैथली शरण गुप्त के अनुसार, दिपक श्रमिकों के तप का फल है. पुनित आँचल का प्रतीक है।जयशंकर प्रसाद जी तो, जीवन की गोधली में , कितनी निर्जन रजनी में , तारों के दिप जलाएं कहकर प्रिय के आगमन की प्रतिक्षा करते हैं। भारत के पूर्व प्रधान मंत्री और कवी अटल बिहारी वाजपेयी ने तो देशहित में कहा कि, "आओ फिर से दीप जलाएँ , अंतिम जय का वज्र बनाने नव दधिची की हड्डियाँ गलाएँ. आओ फिर दीप जलाएँ।" यथार्त में दिपों की सार्थकता अप्रतिम है। प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूप में, यही कारण है कि एक नन्हा ज्योर्तिमय दीप देह शांति के पश्चात भी निरंतर जल कर देह का पंचतत्व में विलिन होने का विश्वास दिलाता है।

मित्रों , इस दिपावली पर हम सब मिलकर जाँति-पाँति के बंधन से मुक्त होकर भाईचारे की बाती से मानवता का दीपक जलायें। महापुराण एवं वेदवाणी से "तमसो मा ज्योतिर्गमय" का आह्वान करें। रिश्तों में मधुरता और विश्वास से भरे दिपक को प्रज्वलित करें । भारतीय संस्कृति के प्रतीक रूपी दिपक के प्रकाश से  "सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसंतु निरामया, सर्वे भद्राणी पश्यन्तु माँ कश्चित् दुःख भाग् भवेत् " जैसी भावना  को आलोकित करें।
         सभी पाठकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामना

Thursday, 5 November 2015

इंसानियत को सलाम



मित्रों, आप सभी पाठकों को हार्दिक धन्यवाद। जैसा कि आप में से कई लोगों को पता है कि एक्सीडेंट की वजह से हम ब्लॉग पर पिछले महिने लिखने में असमर्थ रहे। कई पाठकों ने मुझे मेल करके मेरे स्वस्थ होने की शुभकामना दी। आप सबकी शुभकामनाएं और हम जिन बच्चों के लिये कार्य कर रहे हैं उनका प्यार तथा प्रार्थनाओं के बल पर हम स्वास्थ लाभ की ओर अग्रसर हैं और बहुत जल्दी नई ऊर्जा के साथ पूरी तरह से अपने कार्य क्षेत्र में लौट आयेंगे। 

आज हम , आप सबसे इंसानियत के उन हाँथों की बात करेंगे जिनके लिये जाँत-पाँत , धर्म - मजहब या जान पहचान माने नही रखती। हर मुसिबत में सहायता करने को उनके हाँथ तत्पर रहते हैं। बात करते हैं हम अपने एक्सीडेंट की मेरी कार की स्टेरिगं फेल हो गई थी जिससे कार पर कंट्रोल खत्म हो गया और कार सड़क के किनारे 7 फिट गढ्ढे में गिर कर पलट गई,  पलक झपकते ही ये एकसीडेंट हो गया लेकिन पता नही कहाँ से पल भर में कई लोग वहाँ इक्कठे हो गये हम लोगों को कार में से निकालने के लिये। ये वो लोग थे जिनका मकसद हम लोगों को तुरंत बाहर निकाल कर चिकित्सा कक्ष तक ले जाना था। फिर तो सड़क से गुजरने वाले और भी कई इंसानियत के हाँथ हम लोगों की मदद के लिये आगे आये उनमें सफर को जा रही महिलाओं ने भी हमारी मदद की। हम उन सभी इंसानियत के हाँथ को नतमस्तक धन्यवाद करते हैं जो किसी पहचान के मोहताज नही हैं। उस वक्त हम इस अवस्था में नही थे कि उन लोगों को धन्यवाद कह सकें किन्तु आज हम अपने ब्लॉग के माध्यम से तहे दिल से उन सबका शुक्रिया अदा करते हैं और उन सबकी इंसानियत को हमेशा अपने साथ रखते हुए इंसानियत की इस मशाल को अपने द्वारा भी प्रज्वलित रखेंगे।

मित्रों , अक्सर कुछ लोग कहते हुए मिल जाते हैं कि भारत में इंसानियत नही रह गई किन्तु मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि इंसानियत भारत के रग-रग में आज भी विद्यमान है क्योंकि ये मेरे दूसरे एक्सीडेंट का अनुभव है जो हाई वे पर हुआ जबकी पहला एक्सीडेंट इंदौर जैसे महानगर के बीच हुआ था। वहाँ भी पल भर में इंसानियत के हाँथ सहायता को आगे बढ गये थे, यहाँ तक कि जब तक हमारे घर से कोई आ नही गया वो अस्पताल में ही रहे। कहने का आशय ये है कि शहर हो या गॉव हर जगह मदद करने को लोग तैयार रहते हैं। उनको कोई धन्यवाद कहे या न कहे , पेपर में नाम छपे या न छपे , वे तो इंसानियत के नाते हर पल सेवा को तैयार रहते हैं रक्तदान हो या अन्य मदद की गुहार उनके हाँथ सहयोग के लिये सदैव बढते हैं।
मित्रों, मेरे साथ ही नही बल्की जिन लोगों ने भी ऐसी इंसानी मदद का अनुभव किया है उनसे यही गुहार करते हैं कि इंसानियत की इस श्रृंखला (chain) को और बड़ी तथा मजबूत बनायें। हम अपने इस ब्लॉग के माध्यम से , जाने अन्जाने इंसानियत के हाँथों को पुनः सलाम करते हैं. ये प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर हम सबको सच्चा इंसान बनने की सनमति दे

I believe that every human  minds feels pleasure in doing good to another. 

इसी के साथ ये अपील भी करना चाहेंगे कि कार में बैठने वाले सभी व्यक्ति को सीट बेल्ट जरूर लगानी चाहिये क्योंकि सीट बेल्ट बाँधने की वजह से हम लोग एक बहुत बङी दुर्घटना से बच गये थे। दो पहिया वाहन पर भी हेलमेट का इस्तमाल जरूर करना चाहिये 
धन्यवाद 

मन्ना  डे के गाये गीत से अपनी बात को विराम देते हैं. " इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा, यही पैगाम हमारा"


Monday, 5 October 2015

असुविधा के लिये खेद है

मित्रों, शारीरिक अस्वस्थता के कारण अक्टुबर माह में कोई भी लेख पोस्ट नही कर पायेंगे
न्यवाद

अनिता शर्मा

Thursday, 1 October 2015

मिलनसार राष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल्ल कलाम



हम सबके आदर्श ए.पी.जे. अब्दुल्ल कलाम साहब का सम्पूर्ण जीवन हम सबके लिये ज्ञान का भंडार है। उनकी हर जिम्मेदारी हम सभी को नई दिशा प्रदान करती है। राष्ट्रपति के रूप में कलाम साहब को सबसे मिलनसार राष्ट्रपति कहा जाता है। अपने राष्ट्रपति के कार्यकाल में उन्होने कई एतिहासिक कार्य किये जो अविस्मरणिय हैं। उन्होने अपनी इस जिम्मेदारी को भारत 2020 विजन का मंच बनाते हुए एक नई चुनौति को स्वीकार किया था।  कलाम साहब का उद्देश्य था कि राष्ट्रपति भवन जनता की पहुँच के लिये सुलभ हो। 

कलाम साहब ने राष्ट्रपतिभवन में सबसे पहले ई गर्वनेस का आगाज किया। अर्थात इलेक्ट्रॉनिक्स शासन प्रणाली की शुरुवात किये। जिसके तहत सभी पत्र, फाइलें और दस्तावेजों को स्कैन करके उन्हे इलेक्ट्रॉनिक रूप में बदला जाने लगा तथा पहचान के लिये प्रत्येक पर बार कोड अंकित  किया गया। ई-गर्वनेस लागु होनेपर केवल पाँच घंटे में चालिस अर्जियों का निपटारा होने लगा जबकि पहले बीस अर्जियों को निपटाने में सात दिन लग जाते थे। 

राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के सांसदों के साथ राष्ट्रपति भवन में सुबह के नाश्ते पर उनके राज्यों का सीधा हाल जानना , राष्ट्रपति कलाम साहब की प्रारंभिक दिनों की महत्वपूर्ण गतिविधी थी। देश के विकास के तीन आधारों , 1- विकसित भारत की संकल्पना, 2- उस राज्य या यूनियन टेरिटरी की सम्पदा, 3- उस राज्य की विशिष्ट क्षमताओं पर जोर दिया गया तथा उस राज्य के सांसदों को सर्वे के आधार पॉवर पॉइंट के जरिये समझाया गया । कलाम साहब की पहली मिटिंग बिहार के सांसदों के साथ हुई थी। उनका मानना था कि राष्ट्रपति भवन ही एक मात्र ऐसा स्थान है जहाँ दलगत मतान्तर खत्म हो जाता है और प्रत्येक सांसद राष्ट्रहित को एक सम्पूर्ण ईकाइ के रूप में देखता है। 

कलाम साहब अपनी पुस्तक टर्निग प्वॉइंट में लिखते हैं कि, "मुझे राष्ट्रपति के रूप में दोनों सदनों को दस से अधिक बार संबोधित करने का मौका मिला। जहाँ मैं देशहित के अपने विचारों को उन्हे समझा सका। 2007 में जब देश 1857 के संर्घष की 150वीं ज्यंति मना रहा था, तब कलाम साहब ने अपने भाष्ण में कहा था कि, सच्ची स्वतंत्रता और स्वाधीनता के लिये अभी हमारा आन्दोलन पूरा नही हुआ है। प्रिय सांसदों और विधायकों, समय आ गया है कि हम सब नये संक्लप और नेतृत्व के साथ देश को सम्पन्न, एकताबंद्ध, सामजस्यपूर्ण, विपुल एंव समृद्ध करते हुए इसे सुरक्षित राष्ट्र बनायें जो अतिक्रमण तथा सीमा पार के घुसपैठ के लिये अभैद हो।" कलाम साहब के कार्यकाल में वर्ष 2003 और 2005 में राष्ट्रपति भवन में आयोजित राज्यपालों के सम्मेलनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 

कलाम साहब के राष्ट्रपति कार्यकाल की अन्य प्रेरणास्रोत बातों के साथ मंगलवार को पुनः मिलते हैं।
गाँधी ज्यंति और लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिन पर अंनत बधाईयां। 

गाँधी जी एवं लाल बहादुर शास्त्री जी पर मेरे पूर्व के लेख पढने के लिये लिंक पर क्लिक करें 
धन्यवाद








Sunday, 13 September 2015

भारत माता के भाल की बिन्दी है हिन्दी

मित्रों, ये बहुत खुशी की बात है कि दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन भारत के ह्द्रय कहे जाने वाले राज्य मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सम्पन्न हुआ। मेरा प्रश्न ये है कि क्या हम एक दिन या दिवस मनाकर हिन्दी को विश्व भाषा बना सकते हैं?

जबकी हिन्दी भारत माता के भाल की बिन्दी है, भारत के दिल की धङकन है हिन्दी। 

अतः मित्रों हमें ये प्रण करते हुए कि हिंदी को विश्व की सबसे प्रमुख भाषा बनायेंगे । इसके लिये हर पल हिंदी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनायेंगे। 


एक अपील, हिंदी को लेकर जो मेरे विचार हैं वो पूर्व के लेख में अवश्य पढें। 



Wednesday, 9 September 2015

ए.पी.जे.कलाम और ह्वीलर द्वीप



मित्रों, अभी हाल में ही उड़ीसा सरकार ने ह्वीलर द्वीप का नाम हम सबके प्रिय अब्दुल कलाम साहब के नाम कर दिया है। उनके सम्मान में ये कदम बहुत प्रशंसनिय है। ह्वीलर द्वीप से कलाम साहब का क्या नाता रहा है?  इसके बारे में आप सबसे कलाम साहब के संस्मरण को साझां करना चाहेंगे, जो उन्होने अपनी पुस्तक टर्निंग प्वाइंट में उल्लेखित किया है। 

मिसाइल मैन अब्दुल कलाम साहब अपनी पुस्तक में  जिक्र करते हैं कि, 'ये उन दिनों की बात है जब पृथ्वी मिसाइल का सफल परिक्षण हुआ था।इसी के साथ सेना की एक और जरूरत सामने आई जिसमें उन्हे जमीनी क्षेत्र के लिये एक आधुनिक यंत्र की आवश्यकता थी। जिसके लिये हम लोग जिस मरुस्थली क्षेत्र में अपने परिक्षण कर रहे थे, वह सुरक्षा व अन्य कारणों से उपयुक्त नही था। हमें अपने इस काम के लिये पूर्वी तटिय क्षेत्र के किसी निर्जन द्वीप की जरूरत थी।


भू जलीय नक्शे में हमें उड़ीसा तट पर कुछ निर्जन द्वीप नजर आये। वहाँ भू भागों की सम्भावना थी। हम अपनी टीम जिसमें  डॉ़ एस.के.सलवन तथा डॉ. वी.के. सारस्वत शामिल थे। धमरा से एक नौका किराये पर ली गई और हम सब द्वीप की तलाश में निकल पड़े। नक्शे पर इन द्वीपों के संकेत 'लौंग ह्वीलर', 'कोकोनट ह्विलर' और 'स्मॉल ह्विलर' के नाम से लिखे हुए थे। टीम ने एक कमपास( दिशासूचक यंत्र) लिया और यात्रा पर निकल पड़े। टीम रास्ता भटक गई उसे ह्वीलर द्वीप नही मिला लेकिन सौभाग्य से , उन्हे कुछ मछुआरे अपनी नौकाओं में दिखे। उनसे रास्ता पूछा गया। उन मछुआरों को ह्वीलर द्वीप का  तो पता नही था लेकिन उन्होने चन्द्रचूड़ नाम के एक द्वीप का जिक्र किया। मछुआरों ने सोचा कि ये लोग इसी द्वीप का पता पूछ रहे हैं। उन्होने चंद्रचूड़ द्वीप का पता बता दिया। उनके बताये हुए  रास्ते से टीम चंद्रचूड़ पहुंची और बाद में पता चला कि वही स्मॉल द्वीप है और वहाँ हमारी जरूरत भर जगह पर्याप्त है।

उस द्वीप को पाने के लिये हमें उड़िसा नौकरशाही का सामना करना पड़ा। यह जरूरी हुआ कि इसके लिये उड़िसा के तत्कालीन (1993) मुख्यमंत्री से राजनितिक निर्णय पाया जाये। उस समय शक्ति सम्पन्न नेता बीजू पटनायक मुख्यमंत्री थे। उनके कार्यालय से संकेत मिल रहा था कि वह द्वीप किन्ही कारणों से उपलब्ध नही हो पायेगा। खैर हमारी विनय स्वरूप हमें बीजू पटनायक से भेंट करने का अवसर मिला। जब हम उनके कार्यालय में पहुँचे तो फाइल उनके सामने रखी हुई थी। उन्होने कहा, 'कलाम, मैने ये पाँचो द्वीप डी.आर.डी.ओ. को बिना किसी किमत के देने का फैसला लिया है, लेकिन मैं इस फाइल पर अपनी स्वकृति हस्ताक्षर तभी करुंगा जब तुम्हारी ओर से  एक वादा किया जायेगा। उन्होने मेरा हाँथ अपने हाँथ में थाम कर कहा, ' तुम्हे एक मिसाइल ऐसी बनानी पड़ेगी जो दूर के दुश्मनों से भी हमारी रक्षा कर सके'। मैने कहा, 'सर, हम जरूर इसपर काम करेंगे। मैने तुरंत रक्षा मंत्री को सूचना दी। मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर होने के बाद हमें स्मॉल द्वीप मिल गया।
  
पाठकों इस प्रकार कलाम साहब के अनुरोध पर ये द्वीप डी.आर.डी.ओ. को रॉकेट प्रक्षेपण के लिये उपलब्ध हो सका। उनके महत्वपूर्ण प्रयासों से आज ये द्वीप विश्व के महान प्रक्षेपात्रों में शामिल है।

2 दिसंबर 2014 को परमाणु सक्षम अग्नी IV मिसाइल का परिक्षण उङीसा के ह्वीलर द्वीप के एकीकृत परिक्षंण रेंज से किया गया था। नि:संदेह ह्विलर द्वीप का नाम 'कलाम द्वीप' हो जाने से देश के युवाओं और वैज्ञानिकों को प्रेरणा मिलेगी। 

प्रिय पाठकों, अब्दुल्ल कलाम साहब   के सफर से जुड़े कुछ और संस्मरण आप सबसे इस महिने हर हफ्ते सांझा करेंगे। 

धन्यवाद

Tuesday, 1 September 2015

जिन्दगी की राह को आंतरिक ऊर्जा से रौशन करें।


मित्रों, हम सबके भीतर अजस्र ऊर्जा शक्ति छिपी पङी है जिसे न तो हम 
पहचान पाते हैं और ना ही उसका समुचित उपयोग कर पाते हैं। जिस तरह से एक छोटे से बीज में एक बङा वृक्ष बनने की हर क्षमता होती है लेकिन कई बार सही पोषण न मिलने से वो अपने प्रारंभकाल में ही दम तोङ देता है। उसी तरह मनुष्य में भी अपार संभावनाये हैं जो कुछ तो वातारण के कारण पल्लवित नही हो पाती, तो कुछ उसके स्वयं के आलसी व्यवहार के कारण। अक्सर ये भी देखा जाता है कि अपार ऊर्जा के बावजूद कई लोग असफलता के डर से आगे बढने की हिम्मत नही करते। दर असल कमी संसार में नही है कमी तो हमारे मन में है। यदि हम चाहें तो बिगङे काम भी बना सकते हैं।

मित्रों, बात सिर्फ कैरियर की नही है। हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ नाना प्रकार के रिश्ते और अभिलाषायें भी विद्यमान हैं। जिनमें कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक परिवेश की रचना करती हैं। ऐसे में कई बार हम लोग रिश्ते निभाने में भी अपनी अच्छाईयों और अपनी सकारात्मक निःश्चल भावनाओं का आकलन सही तरीके से नही करते।यदि किसी ने कहा कि आप गलत हो तो उसे ही आधार मानकर खुद को कोसने लगते हैं कि, हम तो रिश्ता निभा नही सकते। जबकि ये बहुत बङा सच होता है कि, आपके प्रति लोगों का आकलन  उनके नजरिये से होता है न की आपके नजरिये से, फिर भी नकारात्मक वातावरण  हमारी शुद्ध भावनाओं को आघात कर देते हैं। 

ऐसे में हमें हमारी शुद्ध भावनात्मक ऊर्जा पर विश्वास होना चाहिए। बाहर से दिखने में सभी मनुष्य एक समान दिखते हैं परंतु हर किसी में कोई न कोई न्यूक्लियर शक्ती छुपी हुई है जो सृजन भी कर सकती है और विध्वंस भी कर सकती है। ये तो उसके उपयोग पर निर्भर है। आज विडंबना है ये कि हम अपनी क्षमता को अन्य से कम आंकते हैं और सफलता अर्जित करने वालों को भाग्यशाली कहकर अपने मन को  भी प्रताङित करते हैं। सच तो ये है कि, जिनके दिल में कुछ कर गुजरने के अरमान हैं वो बङे कारनामें कर सकते हैं, फिर चाहे रिश्तों का ताना-बाना हो या कैरियर की ऊँचाइयां सभी में सफल हो सकते हैं। 


स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि,  ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है। 

छोटे से परमाणु में भी अजस्र शक्ति छुपी होती है। जीवन के हर क्षेत्र में अपनी क्षमता को पहचानते हुए आगे बढने में ही सच्ची सफलता है। अतः मित्रों, अपने अन्दर की शक्ति पर विश्वास करते हुए निडर होकर जिन्दगी की राह को आंतरिक ऊर्जा से रौशन करें। 
















Friday, 28 August 2015

रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई



       
 
                        
                          तोड़े से भी ना टूटे जो
                          ये ऐसा मन -बंधन है
                       इस बंधन को सारी दुनिया
                           कहती रक्षाबंधन है


                    रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई
                                                                   
A Raksha Bandhan article

धन्यवाद



Monday, 24 August 2015

भूल होना मानवीय स्वभाव है


हमारा जीवन अनेक रंगो से रंगा हुआ है। कहीं राग है तो कहीं द्वेष है, कहीं सक्रियता तो कहीं आलस्य है, तो कहीं आवेश है तो कहीं विक्षोभ। इन तरह-तरह के मानसिक आवेगों का तुफान तभी थमता है, जब हमारा मन स्थिर रहता है। यदि विचार करें तो आज की फास्ट लाइफ में मन भी बहुत फास्ट दौङता है, ऐसे में गलतियों की संभावना भी बढ जाती है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने अपने जीवन में कोई भी भूल न की हो। प्रायः आवेश या उत्तेजना में हमसे भूल हो जाती है क्योंकि इनके आवेग में मन अस्थिर व अशांत हो जाता है और बुद्धी ठीक तरह से काम नही करती। बाल्याकाल से लेकर जीवन अंत तक कभी न कभी कुछ न कुछ गङबङ हो ही जाती है। परंतु भूलों के विषय में सोचकर अपने व्यक्तित्व को कुंठित कर लेना किसी भी दृष्टी से समझदारी नही है।बल्की भूल का भान होने पर उसे सुधारना एक सकारात्मक पहल है, जिसे प्रायश्चित कहते है। सच तो ये है कि पश्चाताप स्वयं को सुधारने का एक प्रयास होता है। दुनिया में बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं जो गलतियों को छिपाते हैं और स्वंय को सही साबित करते हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है कि, "to err is human" अर्थात गलती इंसान से होती है। ये भी सच है कि, गलतियों से ही सीखकर कई बङे-बङे आविष्कार भी हुए हैं और हम सब भी अपने-अपने जीवन में हुई गलतियों से सबक लेकर कामयाब भी हुए हैं। 

"Mistake are the stepping stones to learning" 

ऐसा कहा जाता है कि, गलती करना मनुष्य की नैसर्गिक और मौलिक पहचान है। सामाजिक ढाँचा और नाना प्रकार की विचारधारा के साथ हम सब जीवन यापन करते हुए अनेक रिश्तों से जुङे होते हैं, जहाँ विचारों की भिन्नता के कारण कई बार छोटी-छोटी अनबन और गलत फहमी हो जाती है। लेकिन यही छोटी-छोटी गलतियाँ कब बङी हो जाती हैं पता ही नही चलता जबकि हम सब ये जानते हैं कि, सच्चे रिश्तों की खूबसूरती एक दूसरे की गलतियों को बर्दाश्त करने में है क्योंकि बिना कमी के  इंसान तलाश करेंगे तो अकेले ही रह जायेंगे। किसी ने सच ही कहा है कि, गलती स्वीकार करने में कभी देर नही करनी चाहिये क्योंकि सफर जितना लंबा होगा वापसी भी उतनी ही मुश्किल होगी। 

"Mistake is a single page of life but relation is a complete book. So don't lose a full book for a single page." 

प्रेंचन्द जी ने अपने एक उपन्यास में कहा था कि, पश्चाताप के कङुए फल कभी न कभी सभी को चखने पङते हैं। सच ही तो है दोस्तों, जिंदगी हैं तो भूलें होती रहेंगी, गलतियाँ भी होगी क्योंकि भूल होना मानवीय स्वभाव का अभिन्न अंग है। लेकिन इन गलतियों और भूलों को मन में बसा लेना समाधान नही है क्योंकि इंसान गलती करके इतना दुखी नही होता बल्की उन गलतियों के बारे में बार-बार सोचकर दुःखी होता है इसलिये दोस्तों,
गलतियों की क्षमा माँगते हुए और गलतियों से सबक लेते हुए आगे बढना ही जिंदगी का सकारात्मक फलसफा है। 

"We all make Mistake. Nobody is perfect. Live it, Learn from it and Move on"  :)