Sunday, 25 January 2015

मेरा भारत महान



सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा, अनेकता में एकता के स्वर को आज भी गुंजायमान कर रहा है। एक सम्प्रभु एवं अखण्ड भारत की कल्पना देश की धरती पर युगों-युगों से जीवित है। गीता, रामायण,वेद एवं पुराण हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता के आधार स्तम्भ हैं। ईद, दिवाली, होली, बैसाखी तो कहीं पोंगल, बिहु जैसे त्योहारों को समेटे हुए भारत देश महान है, जिस पर हम सबको नाज है। हमें अपने भारतीय होने पर गर्व है। आज भले ही आतंकवाद, जनसंख्या विस्फोट, जातिवाद तथा धार्मिक उन्माद बढ रहा है फिर भी हम सबको ये विश्वास है कि ये अंधकार हमारी संस्कृती के प्रकाश से बोझिल हो जाएगा। मुगलों की तबाही, अंग्रेजों की दासता तथा विदेशी ताकतों के अत्याचारों से भी हमारे हौसले टूटे नही हैं। हिमालय की तरह मजबूत फौलाद लिए भारत के हर बच्चे में आज भी सुभाष, आजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी विद्यमान हैं। यहाँ हर बाला लक्ष्मीबाई है।  हमारी संस्कृति, सभ्यता, आध्यात्म तथा नैतिक बल एवं दयालु भावनाओं में, बुद्ध, महावीर तथा नानक मुस्कराते हुए मिल जाएंगे। सामाजिकता ने विवेकानंद, दयानंद तथा कबीर को अपने में समाहित कर लिया है।  गाँधी के राम राज्य की कल्पना आज भी साकार हो रही हैं। गॉव में बसता भारत अपनी समृद्धी और संस्कृति को आधुनिकता की आँधी में भी सुरक्षित रखे हुए है। जब-जब हमारी संस्कृति एवं धर्म पर कुठाराघात हुआ तब-तब किसी न किसी अवतार  ने देश की दिशा और दशा को सुरक्षा प्रदान की है। 21वीं शदी की आधुनिक तकनिक हो या ग्लोबलाइजेशन का ज़माना, हम भारतीय वसुधैव कुटुंबकम और अतिथी देवो भवः की विचारधारा के साथ स्वाभीमान से जीना जानते हैं। आज भी खादी के कपङों और गन्ने के रस का मुकाबला ब्रानंडेड बाजार नही कर सकते। आज हम भले बाहरी रूप में पश्चिमी बन जाएं परंतु हमारी आंतरिक शक्ति और मनोवृत्ति नितांत भारतीय है। चारों दिशाओं में तामसी प्रवृत्तियों का मायाजाल भयभीत कर रहा हो और अनेक समस्याएं अमरबेल की तरह बढ रहीं हों फिर भी उनका अंत निश्चित है क्योकि मन ये विश्वास है, हम होंगे कामयाब। भारतीय पुरातन संस्कृति पर हम सबको गर्व है। अनेक अंर्तविरोधों के बावजूद भारत की गंणतत्रं व्यवस्था आज भी निरंतर गतिमान है।  हमारा गंणतंत्र विश्व का सबसे बङा गंणतंत्र है। हमारा देश अनेक मुश्किलों के बावजूद  गौरव के शिखर पर पहुँचेगा। विश्व विजयी तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा का नारा सदैव बुलंद था और रहेगा क्योकि मेरा भारत महान है। 
                                                  

Wednesday, 21 January 2015

बालिका दिवस पर सभी बेटीयों को बधाई

जिस देश में नारी रूप में अनेक देवीयों की पूजा अर्चना की जाती है। धन, बुद्धी एंव शक्ति के लिए लक्ष्मी, सरस्वती एंव माँ दुर्गा की आराधना की जाती है। उस देश में बेटीयों को अपने अस्तित्व के लिए संर्घष करना पङ रहा है। आज बेटी बचाओ, बेटी पढाओ के अभियान चलाए जा रहे हैं। जबकी बेटा बेटी तो माता-पिता की दो आँखें हैं। बेटी भी बेटे के समान प्रत्येक कार्य कर सकती है, फिर क्यों बेटी को इस दुनिया में आने से रोका जाता है? मित्रों, मैं हर्ष के साथ कहना चाहती हुँ कि, मेरी बेटी ने मुझे सदैव गौरवान्वित किया तथा मेरे बेटे ने भी उसे अपना आर्दश माना एवं बेटे ने भी मुझे गौरवान्वित किया। आज मैं दृष्टीबाधित लोगों के लिए जो कार्य कर पा रही हुँ उसमें सबसे पहला योगदान मेरी बेटी का ही है, उसके बाद मेरे बेटे ने भी इस नेक कार्य़ को आगे बढाने में अपना हर संभव योगदान दिया और बेटे रुपी दामाद ने भी इस कार्य हेतु योगदान दिया तथा आज भी
ये सब अपना योगदान दे रहे हैं। निःसंदेह बेटी और बेटों के योगदान का ही परिणाम है कि आज हम अधिक से अधिक दृष्टीबाधित बच्चों को शिक्षा के माध्यम से आत्म निर्भर बना पा रहे हैं।

सच तो ये है दोस्तों, बेटी और बेटे में अंतर करना सिर्फ हमारे समाज की संकीर्ण सोच है और दहेज प्रथा  जैसी कुरीतियों का डर है। यदि समाज से दहेज रूपी दानव का अंत हो जाए तो  समाज में लङकियों को बोझ समझने वालों की विचारधारा भी बदल सकती है। इसके लिए जरूरी है कि, हम ये प्रण करलें  न दहेज लेंगे और न दहेज देंगे। बेटी और बेटे की वजह से ही भविष्य में नए परिवाऱों का सृजन होता है। विचार कीजिए!  परिवार, समाज, देश और विश्व की कल्पना सिर्फ एक पक्ष अर्थात बेटों से ही क्या संभव हो सकती है?  समय रहते बेटीयों को भी बेटों के बराबर का सम्मान दिजीए। बेटीयों को दान या पराया धन न समझते हुए उसे भी आगे बढने का अवसर दीजिए। प्रसिद्ध कवित्री सुभद्राकुमारी चौहान जब अपनी बेटी की शादी कर रहीं थीं तो, विवाह संस्कार में कन्यादान की प्रथा को करने से, उन्होने एवं उनके पति ने ये कहते हुए मना कर दिया कि मेरी बेटी कोई वस्तु नही है और उन दोनों ने कन्यादान की रस्म नही की। कहने का आशय ये है कि बेटी और बेटा तो प्रकृति के दो आधर स्तंभ हैं। एक के कमजोर या कमतर होने से सामजिक ढांचा चरमरा जायेगा। अंततः यही कहना चाहुँगी अपनी दोनों आँखों की देखभाल एक समान कीजिए आपकी दृष्टी ही इस सृष्टी का आधार है।

धन्यवाद
voiceforblind@gmail.com

sharmaanita207@gmail.com
कृपया लिंक पर क्लिक करके अवश्य पढेंः-      

बेटी है तो कल है 

Sunday, 18 January 2015

दृष्टीबाधितों के लिए सहयोग की मशाल जलाएं (Co-operate The BLIND)

मित्रों, हम सब एक सामाजिक प्राणी है, हमारी उन्नति सहयोग की बुनियाद पर ही निर्भर है। जिस प्रकार ईंट से ईंट जोङकर विशाल भवन बनता है, पानी की एक-एक बूंद से सागर बनता है। उसी प्रकार अनेक व्यक्तियों के परस्पर सहयोग से ही मनुष्य का विकास संभव है। समाज और राष्ट्र की समृद्धि परस्पर सहयोग पर ही निर्भर है।

ऐसे ही सहयोग की कामना दृष्टीबाधित बच्चे भी हम सभी से रखते हैं। अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए आज कई दृष्टीबाधित लोग अपने हौसले की रौशनी में अपनी मेहनत शिक्षा और विज्ञान के आधुनिक उपयोग से आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रहे हैं किन्तु समाज एवं सरकार की उदासीनता की वजह से कई बार आगे बढने से वंचित रह जाते हैं। कई दृष्टीबाधित बच्चे खूब मन लगाकर पढाई करते हैं; किन्तु परीक्षा के समय सहलेखक (Scribe) न मिलने कारण या राइटर के देर से आने के कारण परीक्षा देने से वंचित हो जाते हैं। जिसके कारण उनका भविष्य प्रभावित होता है। पूरे वर्ष सफलता के सपने लिये तैयारी करते दृष्टीबाधित बच्चों का सपना सामाजिक उदासीनता की वजह से टूट जाता है। हमारी शैक्षणिक व्यवस्था में लगभग 9वीं कक्षा से उच्च कक्षा हेतु ब्रेल में पर्याप्त पुस्तकें नही प्राप्त हो पाती है। दृष्टीबाधित बच्चे विषय संबन्धित पाठ्यक्रम को सुन करके याद करते हैं, जो कई सामाजिक संस्थाएं या समाज के कुछ लोग रिकार्ड (Record) कर देते हैं। परंतु आवाश्यकता के अनुसार रेर्काडिंग उपलब्ध नही हो पाती।

मित्रों, सामाजिक चेतना का सहयोग मिले तो निःसंदेह दृष्टीबाधित बच्चों में भी आत्म सम्मान से जीवन जीने की मानसिकता का विकास होगा, जो समाज और देश के लिये हितकारी होगा। आपका एक सार्थक प्रयास कई दृष्टीबाधित बच्चों के जीवन को रौशन कर सकता है और उनके आत्मनिर्भर बनने के प्रयास में सहयोग दे सकता है। दोस्तों, जिस धरती पर स्वामी विवेकानंद जी जैसी महान विभूती का मार्ग-दर्शन प्राप्त हो वहाँ सामाजिक चेतना का अभाव असंभव है, सिर्फ थोङी जागरुकता की आवश्यकता है। यदि हम सब मिलकर दृष्टीबाधित बच्चों के लिए कार्य करें, तो सहयोग की मशाल से अनेक दृष्टीबाधित बच्चों का जीवन खुशनुमा बन सकता है और वे आत्मनिर्भर हो सकते हैं। आप लोगों में से जो भी दृष्टीबाधित लोगों की सहायता करना चाहतें हैं वो हमें मेल कर सकते हैं।  मित्रों, इस कार्य हेतु आपका दिया वक्त उनके लिये जीवन का सबसे अनमोल तोहफा होगा और सामाजिक भावना का सुनहरा पैगाम होगा। मित्रों, "वाइस फॉर ब्लाइंड" (Voice For Blind) के सदस्य बनकर सहयोग की आवाज को सम्पूर्ण भारत में प्रसारित करें। 

आपके सहयोग की प्रतिक्षा में
अनिता शर्मा
Mail Id- voiceforblind@gmail.com 
धन्यवाद J




Friday, 16 January 2015

दृष्टीबाधिता के कारण Cause of blindness

मित्रों, हमारी पाँच इंद्रियों (आँख, नाक, कान. त्वचा और जीभ) में, आँखें अनमोल हैं, इसी के कारण हम दुनिया की खूबसूरती को देख पाते हैं। यदि विज्ञान के अनुसार चलें तो हम 80% ज्ञान आँखों के माध्यम ये प्राप्त करते हैं। परन्तु कुछ अज्ञानता और लापरवाही के कारण हम अपनी आँखों की रौशनी को खो देते हैं या संक्रमण के कारण हमारे आँखों की रौशनी चली जाती है। हमारे समाज में एक ऐसी मानसिकता व्याप्त है कि अंधापन अर्थात दृष्टीबाधित पिछले जन्मों में किए गये गलत कार्यों का परिणाम है। आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं जिसे विज्ञान का युग भी कहा जाता है। ऐसे में उपरोक्त मानसिकता सिर्फ अशिक्षा का ही उदाहरण है। जबकी सच तो ये है कि, समस्त विश्व में दृष्टीबाधित अर्थात अन्धापन का कारण, कई प्रकार की बिमारियाँ, अस्वछता तथा उदासीनता है। भारत में सर्व प्रथम दृष्टीबाधिता का कारण रुबैला वायरस अथवा जर्मन मिजल्स होता था।

भारत में दृष्टीबाधिता के कारण
टैक्रोमा, (रोहे या कुकरे):-  ये रोग अति प्राचीन काल से अंधता का विशेष कारण रहा है। अक्सर गॉव में स्कूल जाने वाले बच्चों में ये रोग देखने को मिल जाता था। प्रायः बचपन इस रोग का शिकार हो जाता है। इस रोग में कार्निया में घाव हो जाता है, जो बाल्यकाल में ही ध्यान न देने से अंधता का कारण बन जाता है। 33% दृष्टीबाधिता इस रोग के कारण होती है। ये बिमारी विशेष प्रकार के वायरस कैलेमाइडिया ट्रैकोमेडिस(Chlamydia Trachomatis) के द्वारा होती है। इस रोग से प्रभावित व्यक्ति के आँख और नाक से परोक्ष(Direct) या अपरोक्ष(Indirect)  रूप से सम्पर्क में आने से ये रोग फैलता है। अस्वछता, गन्दा पानी और खुले में शौच के कारण ये व्यस्कों की बजाय बच्चों में तेजी से फैलता है। गरीब देशों और गरीब लोगों में इस बिमारी से ग्रसित दृष्टीबाधितों की संख्या बहुत ज्यादा है। इस बिमारी का प्राथमिक लक्षणं है, आँखों में सुजन, आँख लाल होना एवं आखों में दर्द।
ग्लुकोमा/काँचबिन्दुः-  ग्लुकोमा बहुत खतरनाक बिमारी है।  जिसमें आँख के अंदर के पानी का प्रेशर धीरे-धीरे बढ जाता है। जिसके कारण देखने में परेशानी होती है या फिर अंधापन भी हो सकता है। यदि उपचार समय से शुरु कर दिया जाए तो, इससे बचा जा सकता है। परंतु अज्ञानता और लापरवाही की वजह से इससे ग्रसित व्यक्ति दृष्टीबाधित हो जाता है। 
ऑप्थैल्मिया नियोनोटेरम :-  जन्म के अवसर पर माता के संक्रमित जनन मार्ग द्वारा शिशु का सिर निकलते समय उसकी आँखों में संक्रमण हो जाता है और इससे ग्रसित बच्चा जन्म से ही अंधता का शिकार हो जाता है। इसका लक्षण है, जन्म के तीन दिन में ही बच्चे की आँखें सूज जाती हैं तथा पलकों के बीच में से मटमैला गाढा स्राव निकलने लगता है। लगभग पिछले 10 वर्षों से ये रोग पेनिसिलीन और सल्फोनेमाइड के कारण कम हुआ है। 
चेचक बङी माताः-  इस रोग में कार्निया पर बङे-बङे दाने उभर आते हैं। जिससे वहाँ वर्ण बन जाने से विकार उत्पन्न हो जाता है। जो अंधता का कारण बनता है। आजकल दो बार चेचक का टीका लग जाने से इस बिमारी का प्रकोप काफी हद तक कम हो गया है। 
कारनील अल्सरः-  अलसर अक्सर पुतली की रगङ और बाह्य तत्व से होता है। जब कोई बाह्य तत्व पुतली में रह जाता है तो, वह अल्सर का कारण बन जाता है। जिसके कारण आँखों की रौशनी प्रभावित होती है। अतः आँख में जब कुछ तिनका या धूल या किढा चला जाए तो आँख को साफ पानी से धोएं किसी भी स्थिती में आँख को मले नही। यदि फिर भी आराम न हो तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।
जेराफथा लमियाः-  यह विटामिन ए की कमी से होता है। इसका प्रमुख लक्षण है, रात को दिखाई नही देना। सूर्यास्त होने पर आँख की झिल्ली और पुतली अपनी चमक खो देती है। लापरवाही और उदासीनता की वजह से पुतली में निशान पङ जाता है और अल्सर की शिकायत शुरु हो जाती है।
नेत्रश्लेष्मा लाशोधः-  ये आँख की सामान्य बिमारी है, जो बेक्टेरिया, वायरस इन्फैक्शन, एलर्जी आदि से होती है। प्रारम्भिक लक्षण है आँख में जलन। समय पर डॉक्टर की सलाह से इसे आगे बढने से रोका जा सकता है। इसके अलावा हाइपर टेंशन, मोतियाबिंद और डाइबिटीज भी दृष्टीबाधिता के कारण हैं।

मित्रों, केन्द्र सरकार के आँकङों के अनुसार भारत में एक करोङ से अधिक दृष्टीबाधित लोग रहते हैं। जो कहीं न कहीं उपरोक्त कारणों से दृष्टीबाधित हुए हैं। हमारे समाज में इस त्रासदी का  बहुत बङा कारण अशिक्षा  है। कई परिवार हमने ऐसे देखे हैं जहाँ एक दो बच्चे दृष्टीबाधित हो जाने के बाद भी अभिभावक कारण समझ नही पाते।  हमारे गॉवों की स्थिती तो और भी चिंता जनक है। अतः अंत में यही कहना चाहेंगे की आँखे प्रकृति का अनमोल और नाजुक उपहार है। इसका ख्याल रखना हम सबकी जिम्मेदारी है और नेत्र दान की भावना सबकी सामाजिक जिम्मेदारी है। आपकी आँखें मृत्यु के बाद भी किसी के जीवन को रौशन कर सकती हैं। 
धन्यवाद 
Anita Sharma

Mail ID:-  voiceforblind@gmail.com
                  
                  sharmaanita207@gmail.com   




Tuesday, 13 January 2015

VOICEFORBLIND में आप सबका स्वागत है



तिल गुढ की मिठास के साथ आप सबको मकर संक्राति                     की हार्दिक शुभकामनाएं 

VOICEFORBLIND में आप सबका स्वागत है। 
 लिंक पर क्लिक करके अवश्य पढें।


धन्यवाद 
Mail ID- voiceforblind@gmail.com
               sharmaanita207@gmail.com 


Monday, 12 January 2015

दृष्टीबाधितों की सहायता कैसे कर सकते हैं।

सामाजिक जिम्मेदारी को निभाने की इस जागरुकता में हम आपका अभिनंदन करते हैं। 

क्लब का उद्देश्यः- 
"शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित छात्रों को आत्मनिर्भर बनाना" 

मित्रों, हमारे समाज में एक विचार धारा व्याप्त है कि, दृष्टीबाधित लोगों को एक विशेष प्रकार की शिक्षा (ब्रेल लीपी) के माध्यम से पढाया जा सकता है। ये पूरी तरह से सच नही है। कोई भी शिक्षित व्यक्ति दृष्टीबाधित बच्चों को पढा सकता है, उसके लिए ब्रेल लीपी का आना अनिवार्य नही है। उनकी शिक्षा-दिक्षा भी सरकार द्वारा चलाए गये पाठ्यक्रम के अनुसार ही होती है। सामान्यतः कक्षा आठवीं तक सरकारी पाठ्यक्रम की पुस्तकें ब्रेल में उपलब्ध हैं। कक्षा नवीं से आगे की कक्षाओं के लिए ब्रेल में पर्याप्त अध्ययन सामग्री उपलब्ध नही है। जिसके लिए पाठ्य सामग्री को दृष्टीसक्षम लोग रेकार्ड(Record) करते हैं और उस रेकार्ड की गई अधययन सामग्री को दृष्टीबाधित बच्चे सुनकर याद करते हैं।

उनकी सहायता कैसे कर सकते हैं?
 1:-  Friends,  आप उनकी पाठ्य सामग्री को रेकार्ड(Record) कर सकते हैं। 
(इस कार्य हेतु आप अपनी आवाज में एक ऑडियो हमे मेल करें या वाट्सअप पर भेंजे। हिंदी एवं अंग्रेजी जिस भी भाषा में आप रेकार्ड करना चाहते हैं)

2:-  आप उनके लिए परिक्षा के समय सहलेखक (Scribe) का कार्य कर सकते हैं। इसके अंर्तगत दृष्टीबाधित बच्चे उत्तर बोलते हैं आपको उन उत्तरों को उत्तर-पुस्तिका पर लिखना होता है और पेपर पढ कर उनको प्रश्न बताना होता है। बैंक, रेलवे तथा अन्य प्रशासनिक प्रवेश परिक्षाएं ज्यादातर रविवार को आयोजित होती हैं। इसमें भी सहलेखक (Scribe) की आवश्यकता होती है।  

वर्तमान मे संस्था अपने दृष्टी दिव्यांग साथियों के लिये इंदौर में कम्प्युटर प्रशिक्षण के लिये एक सेंटर शुरु करना चाहती है क्योंकि कम्प्युटर ज्ञान उनके लिये आँखों के समान है। इसी के साथ 
 पाठ्यसामग्री को रेकार्ड करने हेतु एक स्टुडियो का निर्माण करने की योजना भी है। आप सभी से निवेदन है कि. इस कार्य हेतु अपनी क्षमतानुसार आर्थिक मदद करें। अपने एवं अपने परिवार के जन्मदिन पर शिक्षा की इस मुहीम में आपके द्वारा दिया गयाआर्थिक योगदान सहयोग किसी दृष्टीबाधित बच्चे को आत्मनिर्भर रहते हुए सम्मान से जीने का उजाला दे सकता है। इस कार्य हेतु यदि आपके मन में कोई और जिज्ञासा(Curiosity) हो तो आप मेल करके पूछ सकते हैं।
                  Sharmaanita207@gmail.com

धन्यवाद

Anita Sharma 

Sunday, 11 January 2015

Cooperate the blind


मित्रों, स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिवस पर, आपलोगों के सहयोग की कामना लिए, 12 जनवरी 2015 को हमने Voice for blind (वाइस फॉर ब्लाइंड) क्लब का गठन किया था। क्लब की पहली सालगिरह पर आप सभी क्लब सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई। 

क्लब अपने उद्देश्यः- शिक्षा के माध्यम से दृष्टीबाधित बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने में सार्थक प्रयास की और अग्रसर है। शिक्षा संबन्धी पाठ्य पुस्तक तथा विभिन्न प्रतियोगी परिक्षाओं हेतु जैसे कि, बैंक,रेल,आई.ए.एस., यू.जी.सी.नेट की अध्ययन सामग्री के ऑडियो को सुनकर आज अनेक बच्चे स्टेट बैंक, युनियन बैंक, आन्ध्र बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में सेवायें दे रहे हैं। नई टेक्नोलॉजी को अपनाते हुए क्लब की सेवायें वाट्सएप तथा स्काईप के माध्यम से भी लोगों को लाभान्वित कर रही हैं। कम्प्युटर के ज्ञान ने आज विजुअल चैलेंज लोगों की शिक्षा को आसान कर दिया है। आप सबके सहयोग से ये कारावां आगे भी अनेक दृष्टीबाधित लोगों के जीवन में सम्मान का प्रकाश फैलायेगा। आप सबको इस सहयोग के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। 
  
जय भारत
धन्यवाद
अनिता शर्मा



12 जनवरी 2015 का संदेश 
आज हम एक संगठन (Club) का आधार रख रहे हैं, जिसका नाम Voiceforblind (वाइस फॉर ब्लाइंड) हैं। आप लोगों में से जो भी दृष्टीबाधित छात्र या छात्राओं की सहायता करना चाहतें हैं, वो हमारे इस संगठन का सदस्य बन सकते हैं।
दोस्तों, आप लोगों के मन में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि, हम दृष्टीबाधित छात्र या छात्राओं की सहायता किस प्रकार कर सकते हैं। हम अपने अनुभव के आधार पर यह आसानी से कह सकते हैं कि, कोई भी शिक्षित दृष्टी सक्षम व्यक्ति, दृष्टीबाधित लोगों की मदद कर सकता है। मुख्यतः, उनकी पाठ्य सामग्री को रेकार्ड करना एवं परिक्षा के समय सहलेखक (Scribe) के रूप में अपना योगदान देना। इसके अलावा आप जिस भी शहर में हैं वहाँ की दृष्टीबाधित संस्था में जाकर उन्हे पढा भी सकते हैं।
अब ये बताना चाहुँगी कि, आप ये सब कैसे कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों से हम भारत के कई शहरों के दृष्टीबाधित बच्चों से जुङे हैं। आप जिस भी शहर में हैं यदि वहाँ के कोई दृष्टीबाधित छात्र या छात्राएं रेकार्डिंग या सहलेखक की मदद माँगता है तो हम उसको आपका नम्बर दे सकते हैं, जिससे उन्हे उसी शहर में सहयोग मिल जाए। साथ ही आप अपने शहर के दृष्टीबाधित बच्चों के  लिए कार्य करने वाली संस्था की जानकारी नेट के माध्यम से आसानी से प्राप्त कर किसी संस्था से जुङ सकते हैं।
इस कार्य हेतु आपका दिया वक्त उनके जीवन का सबसे अनमोल तोहफा होगा। विस्तृत जानकारी के लिए आप हमें ई मेल भी कर सकते हैं।
आपके सहयोग की प्रतिक्षा में
अनिता शर्मा
धन्यवाद J


Friday, 9 January 2015

स्वामी विवेकानंद जी की मुंशी फैज अलि के साथ हुई धार्मिक चर्चा


आज देश में धर्म और जाति को लेकर अनेक विवाद विद्यमान हैं। मानवीय संवेदना धार्मिक और जातिय बंधन में इस तरह बंध गई है कि इंसानियत का अस्तित्व कहीं खोता हुआ नज़र आ रहा है। ऐसे में स्वामी विवेकानंद जी के प्रेरणादायी प्रसंग इन जातिय और धार्मिक बंधनो को खोल सकते हैं जिससे इंसानियत पुनः स्वंतत्र वातावरण में पल्लवित हो सकती है। भारत  भ्रमण के दौरान राजस्थान में स्वामी जी की मुलाकात मुंशी फैज अली  से हुई थी।  मुशी  फैज अली और स्वामी विवेकानंद जी के मध्य धर्म को लेकर जो वार्तालाप  हुई,  उसी  का एक अंश आप सबसे सांझा करने का प्रयास कर रहे हैं।

मुशीं फैज अली ने स्वामी जी से पूछा कि, स्वामी जी हमें बताया गया है कि अल्लहा एक ही है। यदि वह एक ही है, तो फिर संसार उसी ने बनाया होगा।

स्वामी जी बोले, "सत्य है।"

मुशी जी बोले ,"तो फिर इतने प्रकार के मनुष्य क्यों बनाये। जैसे कि हिन्दु, मुसलमान, सिख्ख, ईसाइ और सभी को अलग-अलग धार्मिक ग्रंथ भी दिये। एक ही जैसे इंसान बनाने में उसे यानि की अल्लाह को क्या एतराज था। सब एक होते तो न कोई लङाई और न कोई झगङा होता।"

स्वामी हँसते हुए बोले, "मुंशी जी वो सृष्टी कैसी होती जिसमें एक ही प्रकार के फूल होते। केवल गुलाब होता, कमल या रंजनिगंधा या गेंदा जैसे फूल न होते!"

फैज अली ने कहा सच कहा आपने यदि एक ही दाल होती तो खाने का स्वाद भी एक ही होता। दुनिया तो बङी फीकी सी हो जाती! 

स्वामी जी ने कहा, मुंशी जी!  इसीलिये तो ऊपर वाले ने अनेक प्रकार के जीव-जंतु और इंसान बनाए ताकि हम पिंजरे का भेद भूलकर जीव की एकता को पहचाने।


मुशी जी ने पूछा, इतने मजहब क्यों ?

स्वामी जी ने कहा, " मजहब तो मनुष्य ने बनाए हैं, प्रभु ने तो केवल धर्म बनाया है।" 

मुशी जी ने कहा कि, " ऐसा क्यों है कि एक मजहब में कहा गया है कि गाय और सुअर खाओ और दूसरे में कहा गया है कि गाय मत खाओ, सुअर खाओ एवं तीसरे में कहा गया कि गाय खाओ सुअर न खाओ;  इतना ही नही कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि मना करने पर जो इसे खाये उसे अपना दुश्मन समझो।"

स्वामी जी जोर से हँसते हुए मुंशी जी से पूछे कि,  "क्या ये सब  प्रभु ने कहा है ?"

मुंशी जी बोले नही, "मजहबी लोग यही कहते हैं।" 

स्वामी जी बोले,  "मित्र! किसी भी देश या प्रदेश का भोजन वहाँ की जलवायु की देन है।  सागर तट पर बसने वाला व्यक्ति वहाँ खेती नही कर सकता, वह सागर से पकङ कर मछलियां ही खायेगा।  उपजाऊ भूमि के प्रदेश में खेती हो सकती है।  वहाँ अन्न फल एवं शाक-भाजी उगाई जा सकती है। उन्हे अपनी खेती के लिए गाय और बैल बहुत उपयोगी लगे।  उन्होने गाय को अपनी माता माना, धरती को अपनी माता माना और नदी को माता माना क्योंकि ये सब उनका पालन पोषण माता के समान ही करती हैं।"  

"अब जहाँ मरुभूमि है वहाँ खेती कैसे होगी? खेती नही होगी तो वे गाय और बैल का क्या करेंगे?  अन्न है नही तो खाद्य के रूप में पशु को ही खायेंगे। तिब्बत में कोई शाकाहारी कैसे हो सकता है? वही स्थिति अरब देशों में है।  जापान में भी इतनी भूमि नही है कि कृषि पर निर्भर रह सकें।" 

स्वामी जी फैज अलि की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, " हिन्दु कहते हैं कि मंदिर में जाने से पहले या पूजा करने से पहले स्नान करो। मुसलमान नमाज पढने से पहले वाजु करते हैं। क्या अल्लहा ने कहा है कि नहाओ मत, केवल लोटे भर पानी से हांथ-मुँह धो लो?" 

फैज अलि बोला, क्या पता कहा ही होगा! 

स्वामी जी ने आगे कहा, नहीं, अल्लहा ने नही कहा! अरब देश में इतना पानी कहाँ है कि वहाँ पाँच समय नहाया जाए।  जहाँ पीने के लिए पानी बङी मुश्किल से मिलता हो वहाँ कोई पाँच समय कैसे नहा सकता है।  यह तो भारत में ही संभव है, जहाँ नदियां बहती हैं, झरने बहते हैं, कुएँ जल देते हैं। तिब्बत में यदि पानी हो तो वहाँ पाँच बार व्यक्ति यदि नहाता है तो ठंड के कारण ही मर जायेगा। यह सब प्रकृति ने सबको समझाने के लिये किया है।"

स्वामी विवेका नंद जी ने आगे समझाते हुए कहा कि, " मनुष्य की मृत्यु होती है।  उसके शव का अंतिम संस्कार करना होता है। अरब देशों में वृक्ष नही होते थे, केवल रेत थी अतः वहाँ मृतिका समाधी का प्रचलन हुआ, जिसे आप दफनाना कहते हैं। भारत में वृक्ष बहुत बङी संख्या में थे, लकडी. पर्याप्त उपलब्ध थी अतः भारत में अग्निसंस्कार का प्रचलन हुआ।  जिस देश में जो सुविधा थी वहाँ उसी का प्रचलन बढा।  वहाँ जो मजहब पनपा उसने उसे अपने दर्शन से जोङ लिया।"

फैज अलि   विस्मित होते हुए   बोला!  "स्वामी जी इसका मतलब है कि हमें शव का अंतिम संस्कार  प्रदेश और देश के अनुसार करना चाहिये। मजहब के अनुसार नही।" 

स्वामी जी बोले , "हाँ!  यही उचित है।" किन्तु अब लोगों ने उसके साथ धर्म को जोङ दिया। मुसलमान ये मानता है कि उसका ये शरीर कयामत के दिन उठेगा इसलिए वह शरीर को जलाकर समाप्त नही करना चाहता। हिन्दु मानता है कि  उसकी आत्मा फिर से नया शरीर धारण करेगी इसलिए उसे मृत शरीर से एक क्षंण भी मोह नही होता।"  

फैज अलि ने पूछा कि, "एक मुसलमान के शव को जलाया जाए और एक हिन्दु के शव को दफनाया जाए तो क्या प्रभु नाराज नही होंगे?"

स्वामी जी ने कहा," प्रकृति के नियम ही प्रभु का आदेश हैं।  वैसे प्रभु कभी रुष्ट नही होते वे प्रेम सागर हैं, करुणा सागर है।"

फैज अलि ने पूछा तो हमें उनसे डरना नही चाहिए?  

स्वामी जी बोले, "नही!  हमें तो ईश्वर से प्रेम करना चाहिए वो तो पिता समान है, दया का सागर है फिर उससे भय कैसा। डरते तो उससे हैं हम जिससे हम प्यार नही करते।"

मुंशी जी को समझाते हुए स्वामी विवेकानंद जी की पलकें बंद थीं और अश्रु टपक रहे थे। फैज अली स्वामी जी का ये रूप देखकर स्तब्ध रह गए।  प्रेम का ये स्वरूप तो उन्होने पहली बार देखा था। वे वहीं आश्चर्य से खङे रहे और स्वामी जी के पलक खोलने का इंतजार करने लगे। स्वामी जी ये कहते हुए अपनी आँखे खोले कि, "उस परम् पिता को कठोर मानना अपराध है। "

फैज अलि ने हाँथ जोङकर स्वामी विवेकानंद जी से पूछा, "तो फिर मजहबों के कठघरों से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है?" 

स्वामी जी ने फैज अलि की तरफ  देखते हुए मुस्कराकर कहा, "क्या तुम सचमुच कठघरों से मुक्त होना चाहते हो?" फैज अलि ने स्वीकार करने की स्थिति में अपना सर हिला दिया। 

स्वामी जी ने आगे समझाते हुए कहा, "फल की दुकान पर जाओ, तुम  देखोगे वहाँ आम, नारियल, केले, संतरे, अंगूर आदि अनेक फल बिकते हैं; किंतु वो दुकान तो फल की दुकान ही कहलाती है। वहाँ अलग-अलग नाम से फल ही रखे होते हैं। " फैज अलि ने हाँ में सर हिला दिया। 

स्वामी विवेकानंद जी ने आगे कहा कि, "अंश से अंशी की ओर चलो। तुम पाओगे कि सब उसी प्रभु के रूप हैं।" 

फैज अलि अविरल आश्चर्य से स्वामी विवेकानंद जी को देखते रहे और बोले "स्वामी जी मनुष्य ये सब क्यों नही समझता?"

स्वामी विवेकानंद जी ने शांत स्वर में कहा, मित्र! प्रभु की माया को कोई नही समझता। मेरा मानना तो यही है कि, "सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है। जिस प्रकार विभिन्न मार्गो से बहती हुई नदियां समुंद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मत मतान्तर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।" 

मित्रों! हम सबको धर्म और जाति से परे मानवीय संवेदनाओं को यर्थात में अपनाना चाहिये क्योंकि प्रत्येक सजीव जगत में उस सर्व शक्तिमान का वास है; जिसे हम सब ईश्वर, अल्लाह, गुरुनानक या ईशा कहते हैं। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि,  हमें मानव सेवा में ही ईश्वर सेवा की भावना को वास्तविक रूप में अपनाना चाहिए और यही भावांजली स्वामी विवेकानंद जी के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी। 

जय भारत 

युवा शक्ति









Friday, 2 January 2015

आशाओं का दीप जलाएं


मित्रों, हम सब नये वर्ष का स्वागत नई उम्मीद और नई आशाओं के साथ पूरे जोश एवं उत्साह से करते हैं। तारीखें बदल जाती है, कलेंडर बदल जाते हैं किन्तु मन में ये आशा बरकरार रहती है कि, क्या पता आने वाला वर्ष हमारे जीवन को एक सुनहरा यादगार पल दे जाये। ये सच भी है दोस्तों, क्योंकि उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है। जब भी हम लोग हताश या परेशान होते हैं, तो हमारे शुभचिंतक हमें यही कहकर समझाते हैं कि उम्मीद रखो सब अच्छा होगा।  उम्मीद के इस दिये की रौशनी में हम सब अपनो की आशाओं और सपनो को, दुआओं और शुभकामनाओं से प्रकाशित करते हैं।

मित्रों, उम्मीद या आशा तो जीवन का वो अंग है जिसको अपनाने से सकारात्मक परिणामों का आगाज होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टी से तो आशाए या उम्मीद तो एक ऐसा उपचार है, जो अवसाद में चले गये लोगों के लिये रामबांण दवा का काम करता है। 
आज हमारी तरक्की  आशावादी दृष्टीकोंण से ही संभव हुई है। दोस्तों,  लक्ष्य तक पहुँचने में अनेक बाधाएं आती हैं लेकिन आशा की किरण हर मुश्किलों को पार करने की ऊर्जा देती है। उम्मीदें नई ऊर्जा का संचार करती है। मित्रों, उम्मीद कोई सपना नही है उसमें तो आशावादी सपने को हकिकत में बदलने का हुनर होता है। यदि Hope को ध्यान से देखते हैं तो उसका प्रत्येक अक्षर कहता है Have only positive expectations.

मित्रों, आज हम मंगल पर पहुँच गये। नित नई सफलता का कीर्तिमान रच रहे हैं।  क्या कभी सोचे थे कि एक बङा बाजार हमारे हाँथ में होगा जिस पर  क्लिक करते ही हम घर बैठे ही दुनिया भर से शॉपिगं कर सकते हैं?  परंतु इसे स्नेपडील, फ्लिपकार्ड, जबांग, अमेजन डॉट कॉम जैसे ऑनलाइन कारोबार ने संभव कर दिया।  दोस्तों, ये  बाजार की नई तकनिक रातोंरात नही इजाद हुई। इसको बनाने वालों के नए आइडियाज और आशावादी सोच ने  मुश्किलों के भंवर को पार करते हुए इसे संभव किया। आज की युवा पीढी तो ज्यादा क्रिएटिव और इनोवेटिव है। आइडियाज की भी कमी नही है, बस उसे नई उम्मीद के साथ इम्पलीमेंट करने की जरूरत है। हर असफलताएं एक नई सफलता का रास्ता भी दिखाती हैं और निराशाओं में भी आशाओं का एहसास कराती हैं। जिस तरह रात के बाद सुबह की किरण इस बात का आगाज करती हैं कि सब संभव है। उसी तरह निराशाओं के घनघोर अंधकार के छटने पर आशाओं और उम्मीदों के उजाले हमें लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। 

मित्रों, तस्वीर के दूसरे पहलु पर भी ध्यान देना चाहिये।  जिंदगी के सफर में जब हम आगे बढने का प्रयास करते हैं और अपनी सफलता के लिए दूसरों से उम्मीद लगाते हैं, तब हम अपने पैर पर कुल्हाडी मारना जैसी कहावत को ही चरितार्थ करते हैं क्योंकि दूसरों से की गई आशाएं और उम्मीदें अक्सर दुःख का कारण बनती है

अतः हमें आशाओं की ऊर्जा से अपनी काबलियत और कार्यशैली को रिचार्ज करना चाहिये। पुरानी निराशावादी यादों को अपनी मेमोरीकार्ड से डिलिट कर देना चाहिये। जिससे हम सब नये मेमोरीकार्ड में नई उम्मीद के साथ आने वाले सुनहरे पल को संभव कर सकें। मित्रों, उम्मीद तो वर्षों से दरवाजे पर खङी वो मुस्कान है, जो हमारे कानो में धीरे से कहती है सब अच्छा होगा। 



"मन की अलसाई सरिता में, नई उम्मीदों की नाव चलाए।
            नभ की सिमाओं पर, आशाओं का दीप जलाएं।।" 

Have a Successful Year