Wednesday, 24 May 2017

परिस्थितियों का दास नही, स्वामी बने........

दोस्तों, आज की आधुनिक दुनिया में रोजगार के नित नये अवसर बन रहे हैं। नई तकनिकों की क्रांति से आज शारीरिक अक्षमता भी आत्मनिर्भरता में बाधक नही है।आज दरकार है बस उन्हे समझने की और अपनी रुची के अनुसार उसका चयन करने की और एक बार जब हम अपने लक्ष्य को निर्धारित कर लें तो फिर उसी दिशा में आगे बढें। लक्ष्य के मार्ग में परिस्थिती हमेशा अनुकूल ही मिलेगी ये संभव नही है किंतु सकारात्मक दृष्टीकोंण से हम मार्ग में आने वाली बाधाओं को अनुकूल जरूर  बना सकते हैं  ये विश्वास बहुत आवश्यक है। 

मित्रों, कई बार राह में जब आगे बढते हैं तो ठोकर भी लगती है और परिस्थितियां ऐसी भी आ जाती हैं कि मन की भावनाएं आहत हो जाती है। जिससे घबराकर हम आगे बढने से कतराते हैं और विपरीत बातों को याद करते रहते हैं। हम ये भूल जाते हैं कि, नाटक की कहानी में नायक-खलनायक, अच्छे-बुरे-भले सभी पात्र होते हैं.. इनके बिना कहानी आगे नही बढती और न ही कहानी में आनंद आता है। उसी तरह जीवन में भी अच्छी बुरी परिस्थितिया आती रहती हैं और हमारा जीवन भी सुख-दुःख के साथ आगे बढता रहता है। ये हम पर निर्भर करता है कि हम उसे किस तरह समझ रहे हैं। यदि हम हर वक्त बाधाओं के बारे में ही सोचते रहेंगे तो अनजाने में ही सही हम उसे अपने जीवन में आकर्षित ही करते हैं। 

सच तो ये है कि, यदि हम नकारात्मक विचारों की उपेक्षा करते हैं, उन पर ध्यान नही देते तो वो हमारे जीवन में घटित नही होते। इसलिये शुभ एवं सकारात्मक विचारों को ही सोचना चाहिये क्योंकि हमारी सोच चुंबक का काम करती है। यदि हमें वास्तव में आगे बढना है और अपने लक्ष्य को सफलता से हासिल करना है तो विषतुल्य सोच से स्वयं को बचाना चाहिये। जीवन में आगे बढने के लिए हमारा सकारात्मक दृष्टीकोंण एक रामबांण औषधी की तरह है।

दोस्तों, आपको एक सच्ची घटना मणीपुर की बताते हैं, जहाँ 28 वर्ष के IAS आर्मस्ट्रांग पामें ने अकल्पनिय कार्य को साकार कर दिया। वहाँ दुर्गम पहाङियों से लोगों को गुजरने में बहुत तकलीफ होती थी। इस ओर सरकार की उदासीनता से परेशान हुए बिना अपने वेतन से बची जमापूँजी तथा गॉव वालों के सहयोग से सङक बनाने की योजना पर काम शुरु कर दिये। उनके विश्वास को देखकर पङोस के गॉव वालों ने भी आर्थिक सहयोग किया तथा युवाओं ने श्रम दान दिया, जिसकी वज़ह से 100 किलोमीटर लंबी सङक बन गई। जिसका नाम जनता की सङक रखा गया। उनके आत्मविश्वास ने गॉव वालों का रास्ता आसान कर दिया। गॉव वालों ने पामें को मिरेक लायन से विभूषित किया। 

अक्सर कई लोग आगे बढना तो चाहते हैं लेकिन मार्ग में आने वाली तकलिफों का सामना नही कर पाते, जबकी इनमें से कुछ तकलीफें हमारे लिये एक सबक होती हैं और भविष्य में हमें दृण बनाने के लिये हितकारी भी होती हैं। ऐसे में हमारी सोच पत्थर की तरह अङियल न होकर पानी की तरह होनी चाहिये जो किसी भी परिस्थिती में आगे बढने का राह बना ही लेता है, पानी एक छोटे से छिद्र से भी बह जाता है वो अवरोध हटने का इंतजार नही करता। इसी तरह हमें भी विकल्प तलाशते हुए आगे बढते रहना चाहिये न की बाधाओं की दुहाई देकर रुकना चाहिये। जिस प्रकार से राह में आने वाले कंकङ-पत्थर को हम बीन कर नही हटा सकते हैं, लेकिन पाँवों में जूत पहनकर उससे अपने पैर को सुरक्षित रख सकते हैं। ठीक इसी तरह राह में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को हम अपने ज्ञान तथा आत्मविश्वास से दूर कर सकते हैं। 

"Always remember that your present situation is not your final destination. The best is yet to come " 
दोस्तों, भारतीय खेलों के इतिहास में दृष्टीबाधित सागर बहेती ने अपने विश्वास के बल पर एक गौरवशाली अध्याय जोड़ते हुए बोस्टन मैराथन पूरी कर इतिहास रच दिया। वह इस मैराथन में हिस्सा लेने वाले पहले दृष्टीबाधित भारतीय भी हैं। बेंगलुरु के रहने वाले बहेती की यह उपलब्धि इस मायने में खास है कि इस मैराथन के लिए क्वालीफाई करना बेहद मुश्किल और प्रतिस्पर्धी है। सागर ने शारीरिक अक्षमता की सभी मुश्किलों को पार कर यह मुकाम हासिल किया है। उन्होने 42.16 किमी की इस मैराथन को महज 4 घंटे में ही पूरा कर लिया। वर्ष 2016 में पैराओल्मपिक में हमारे कई साथियों ने शारीरिक अक्षमता के बावजूद अपने साहस से परिस्थिती को अनुकूल बनाकर भारत को स्वर्ण और रजत पदकों से गौरवांवित किया है। 

"You can always improve your situation. But you do so by facing it, not by running away." 
अंततः यही कहना चाहेंगे दोस्तों, मनुष्य परिस्थितियों का दास नही है, वरन उनका निर्माता है। ये बात जितनी ज्ल्दी समझ आ जाये सफलता उतनी जल्दी हमारे पास होगी।
बेहतर से बेहतर कि तलाश करो
मिल जाये नदी तो समंदर कि तलाश करो

टूट जाता है शीशा पत्थर कि चोट से
टूट जाये पत्थर ऐसा शीशा तलाश करो

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